अगर खुश होना है तो करें यह काम

जीवन में इच्छा, आशा और तृष्णा जरूरी है। ये बेड़ियां बड़ी आश्चर्यजनक हैं, लेकिन इससे जिसे बांध दो, वह दौड़ने लगता है। बेड़ी से मुक्त कर दो तो वहीं बैठा रह जाता है। अमेरिकी नोवेलिस्ट जेन स्माइली ने कहा कि मेरे अनुभव के अनुसार केवल एक ही प्रेरणा होती है और वह है इच्छा।

यदि हम प्रेरणा, महत्वाकांक्षा और तृष्णा से मुक्त हैं, तो हमारी रफ्तार धीमी होगी। इच्छा, आशा और तृष्णा आदमी को जीवनभर दौड़ाती रहती है, कभी चौन से बैठने नहीं देती। तृष्णा मिट गई तो आदमी आपाधापी छोड़ देगा। सामान्य समझ कहती है कि समस्या बाहर की है तो समाधान भी बाहर ही खोजा जाना चाहिए। यदि समस्या भीतर की है तो समाधान बाहर खोजने से नहीं मिलेगा। भारतीय दर्शनों में एक वैशेषिक दर्शन है, जिसके प्रवर्तक हैं महर्षि कणाद।

वे इतने त्यागी और तपस्वी थे कि धरती पर गिरे अन्न-कणों को चुनकर अपना जीवनयापन करते थे। राजा को आश्चर्य हुआ और इस बात का दुख भी कि मेरे राज्य में लोग इतनी गरीबी में दिन काट रहे हैं। राजा ने कणाद के जीवनयापन के लिए प्रचुर मात्रा में धन-धान्य की व्यवस्था करने की बात कही। यहां भी वही मामला था। महर्षि कणाद की जीवन शैली उनकी सोच से उपजी थी। राजा ने उसे बाहरी वस्तुओं के अभाव के रूप में देखा।आचार्य महाप्रज्ञ ने थोड़ी अलग बात कही है।

उन्होंने कहा है कि बाहर की समस्या को तो भीतर से सुलझाया जा सकता है, किंतु भीतर की समस्या को बाहर से नहीं सुलझाया जा सकता। आपको अभाव महसूस होता है तो यह आपके भीतर की समस्या है। संतोष की चेतना जाग जाए तो पास में कुछ न होने पर भी आप स्वयं को कुबेरपति अनुभव करेंगे। यह भीतर और बाहर की समस्या आदमी को हर क्षण बेचौन किए रहती है। विंसेंट जे. लोंबार्डी ने कहा है कि एक सफल व्यक्ति और असफल व्यक्ति में साहस का या फिर ज्ञान का अंतर नहीं होता है, यदि अंतर होता है तो वह इच्छाशक्ति का।

भ्रष्टाचार की समस्या का एक अच्छा रास्ता यह है कि बड़े कहे जाने वाले लोग अपनी जीवनशैली को संयमप्रधान बनाएं। बड़े व्यापारी, उद्योगपति, सांसद, विधायक, सामाजिक नेता के जीवन में संयम आ जाए तो नीचे तबके के लोग स्वयं प्रेरित होंगे। जिनके पास जरूरत भर के लिए भी नहीं है, उन्हें संयम का उपदेश कोई किस मुंह से दे! चाणक्य भारतीय राजनीति के लिए एक दिव्य प्रेरणा हैं। अपना कार्य करते समय वह राज्य प्रदत्त दीये को बुझा देते और अपना व्यक्तिगत दीया जला लेते थे। आज के मंत्रियों और राज्यकर्मियों के लिए तो यह स्वप्नवत है। व्यक्तिगत जीवन की यह उत्कृष्ट शुचिता अपना उदाहरण छोड़कर शायद चाणक्य के साथ ही चली गई।

(साई फीचर्स)



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