अब बाज़ार से गायब हो गयी अठन्नी!

(शरद खरे)

बाजार से 50 पैसे अर्थात् अठन्नी के दर्शन दुर्लभ हो जाने के चलते नागरिकांे को इन दिनों बेहद असुविधा का सामना करना पड़ रहा हैं। अब उन्हें छोटी वस्तुएं जैसे माचिस, शैम्पू, पाउच, चॉकलेट आदि खरीदने के लिये अठन्नी की बजाय रुपया ही खर्च करना पड़ता है तब जाकर खरीददार को आवश्यक वस्तु मिल पाती है।

इसी प्रकार यदि लेन-देन में ग्राहक को 50 पैसे वापस करना हो तो दुकानदार 50 पैसे की कोई अन्य सामग्री ग्राहक को थमा देता है। ग्राहक भी अब इस बात का विरोध करते-करते थक गये हैं क्यांेकि उन्हें एक लंबे अरसे से अठन्नी के दर्शन तक नहीं हुए हैं। ऐसी स्थिति के चलते आमजन अब यही समझने लगा है कि अठन्नी अब चलन से बाहर हो गयी है।

पहले अक्सर यही कहा जाता था कि आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया। यह कहावत अब बेमानी सी साबित होने लगी है क्योंकि अठन्नी के आभाव में लोगांे को अब रुपया ही खर्च करना मजबूरी बन गया है। अठन्नी के दर्शन दुर्लभ होने का ज्यादातर दोष उन व्यापारियों को जाता है जो लेन-देन के दौरान अठन्नी लेने से साफ इंकार कर देते हैं। ऐसे में उनका दोहरा फायदा हो जाता है, माल भी बिक जाता है और आमदनी भी हो जाती है।

हालात यह हैं कि अनेक स्थानों पर तो चिल्ल्हर होने के बावजूद एक रूपये तक का सिक्का प्रदाय न करते हुए उसके बदले में टॉफी या अन्य कोई वस्तु थमा दी जाती है। सभ्य ग्राहक सब कुछ जानते बूझते भी कोई प्रतिक्रिया न देते हुए चलता बनता है। ऐसा अधिकांश मेडिकल स्टोर्स पर सहज ही देखने को मिल जाता है। इस तरह मूल्य में छोटी मुद्राओं को बाहर का रास्ता दिखाया जाना आम बात सी हो गयी है।

आज स्थिति तो यह हो गयी है कि सभ्य नागरिक तो दूर की बात है, भिखारी भी भीख में अठन्नी लेने की बजाय एक रुपया देने  की माँग करते नजर आते हैं। भारतीय मुद्रा का अपमान इस तरह किया जा रहा है बावजूद इसके प्रशासन मौन ही है। यह कहा जा सकता है कि अभी अठन्नी चलन से तो पूरी तरह बाहर नहीं हुई है लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये तो वह दिन भी दूर नहीं जब 50पैसे का सिक्का इतिहास बनकर रह जायेगा।

अठन्नी का चलन अब लगभग बंद जैसे हो जाने के कारण आमजन को लेन-देन के दौरान एक रूपया खर्च करना पूरी तरह से मजबूरी बनकर रह गया है, बावजूद इसके कि सामान पचास पैसे का ही आ रहा है। विकल्प के तौर पर ग्राहक को एक की जगह दो वस्तुएं खरीदना अनिवार्य हो जाता है। पांडिया छपारा जैसे क्षेत्र में जहाँ अधिकांश अत्यंत निर्धन लोग भी निवास करते हैं, वहाँ उन्हें अठन्नी का अभाव मजबूरी में सहन करना पड़ता है।

जनचर्चा है कि अठन्नी का अभाव कई दुकानदार जानते-बूझते ही बना देते हैं ताकि उनका ज्यादा सामान विक्रय हो सके। विडंबना यह है कि अठन्नी के चलन में बने होने के बारे में प्रशासन के द्वारा आमजन को किसी तरह से आगाह भी नहीं किया जाता है। आमजन यही समझ रहा है कि संभवतः अठन्नी चलन से बाहर हो चुकी है। इसलिये कई लोग तो दुकानदार के द्वारा अठन्नी दिये जाने के बावजूद भी किसी अन्य सामान की माँग कर देते हैं।

जिले के संवेदनशील प्रशासन को चाहिये कि वह इस दिशा में आवश्यक पहल करते हुए लोगों को इस बात से अवगत कराये कि अठन्नी अभी भी चलन में बनी हुई है और इसके लेने या देने से कोई इंकार नहीं कर सकता है। सिर्फ इतना ही काफी न होगा भारत सरकार को आवश्यक मात्रा मेें इसकी उपलब्धता भी सुनिश्चित करना होगा।

पर्याप्त उपलब्धता के अभाव में जिस तरह पाँच, दस, बीस और पच्चीस पैसे चलन से बाहर हो गये हैं, ठीक वैसे ही 50 पैसे के सिक्के का भी हश्र होगा। यही नहीं बल्कि एक दो व पाँच के सिक्के भी इसी राह पर धीरे-धीरे जाने को मजबूर हो जायेंगे। ऐसी स्थिति यदि निर्मित होती है तो दस रूपये से कम के लेन-देन का कोई औचित्य ही नहीं रह जायेगा। इस परिस्थिति का सबसे बड़ा शिकार निर्धन तबका ही बनेगा।



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