अमीर बनना है तो अपनाएं मंदी-प्रूफ धंधे

(आलोक पुराणिक)

अर्थव्यवस्था का हाल प्रभू जैसा हो गया है, जाकी रही भावना जैसी प्रभू मूरत तिन दीखी तैसी। अर्थव्यवस्था के इतने आध्यात्मिक आयाम कभी ना देखे गये कि जिसका जो मन आये, बता दे-जाकी रही भावना जैसी. . .। कोई बता रहा है कि अर्थव्यवस्था एकदम चौपट हो गयी है, सब ठप पड़ा है, कंपनियां बंद हो रही हैं। बात तो यह भी सही ही है रॉबर्ट वाड्रा का धंधा ठप हो लिया है, उनकी कंपनियां भी बंद हो गयी हैं। उनकी कंपनियों के अलावा और भी कंपनियां बंद ना भी हुई हों, पर रोजगार कम हो गया है। एक बड़े बैंक ने मुनाफे बढ़ाकर कर्मचारी कम कर दिये। मैंने पूछा, तो बैंकवालों ने बताया कि सब कमायेंगे तो खर्च कौन करेगा। कर्मचारियों को विदाई पैकेज में लाखों दिये हैं, अब खर्च करें।

खर्च करें, खर्च करें

कार कंपनियों की सेल जून 2017 के बाद 12 प्रतिशत बढ़ गयी है। ट्रक-बस की सेल जून के बाद 23 प्रतिशत बढ़ गयी है। दोपहिया वाहनों की सेल 14 प्रतिशत बढ़ गयी। घरेलू हवाई आवाजाही में 14 परसेंट की बढ़ोत्तरी हो गयी। पर मालिक, किसान की इनकम तो 2 प्रतिशत भी ना बढ़ रही है। अबे तो किसने कहा कि किसानी करें, कार बेचें, स्कूटर बनायें, हवाई जहाज चलायें। जहां अमीरी आ रही है, उन धंधों में जायें।

बहुत खतरनाक जवाब है। खेती किसानी वाले अपने घर-जमीन बेचकर बच्चों को पायलट की ट्रेनिंग दिलवायें, फिर पता चले कि वहां भी हाल टमाटर सा हो लिया है, सप्लाई बहुत है डिमांड बची ही नहीं। तो किसानों सोच समझकर करना काम। केमिस्ट की दुकान खोल लो या शादी का हॉल खोल लो, इन धंधों में कभी मंदी नहीं आती। शादी और बीमारी का विकास हर हाल में होना ही होना है। इसका मतलब यह ना माना जाये कि शादी भी एक बीमारी है, जिससे भारत की अधिकांश आबादी पीड़ित रहती है।

हां दारु का धंधा भी चकाचक है, इसमें भी मंदी कभी ना आती। धंधा चले तो बंदा इंडिया में कार रेस कराता है, धंधा ना चले तो बंदा लंदन में बैठकर मैच देखता है, विजय माल्या की कसम। पर दारु के धंधे में घुसें कैसे। देखिये मैंने तो अमीर बनने का नीतिगत व्यापक जवाब दे दिया, डिटेल्स में जाना मेरी जिम्मेदारी नहीं है।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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