अमेरिका के लंबे हाथ

अमेरिका ने डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया (डीपीआरके) पर नए प्रतिबंध थोपकर चीन की तीन कंपनियों को भी प्रतिबंधित कर दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव ने इसे प्योंगयांग को अलग-थलग करने की रणनीति का हिस्सा बताया है। अमेरिका के कोरिया विरोधी अभियान का चीन बेवजह शिकार बन रहा है। इस वर्ष यह तीसरी बार है, जब ऐसी किसी अमेरिकी कार्रवाई का चीनी कंपनियां या लोग शिकार बने हैं, पर अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता हीथर नार्ट कह रही हैं कि इस सबसे डीपीआरके मुद्दे पर बीजिंग से रिश्ते प्रभावित नहीं होंगे।

हालांकि चीनी विदेश मंत्रालय ऐसे अमेरिकी हथकंडों को प्रभावी सहयोग की दिशा में बाधक मानता है। चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का सख्ती से पालन करने का पक्षधर है। यदि अमेरिका को लगता है कि चीनी कंपनियों के कारण कहीं कोई उल्लंघन है, तो उसे ऐसी जानकारी साझा करनी चाहिए, ताकि चीन भी अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के निर्वहन की शर्तों के साथ उसकी जांच कर सके।

अच्छे रिश्ते परस्पर संवाद से ही संभव हैं और जैसा कि बीजिंग बार-बार कहता आया है वाशिंगटन व प्योंगयांग को स्थिरता बचाए रखने के लिए यह करना ही होगा। वाशिंगटन मान बैठा है कि प्योंगयांग पर लगातार दबाव ही उस पर काबू करने का तरीका है। वह अपनी जनता को यह भी दिखाना चाहता है कि डीपीआरके के बार-बार परमाणु और मिसाइल परीक्षणों के बावजूद वह अपना दबाव बनाए हुए है। लेकिन उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि बीजिंग व वाशिंगटन, दोनों एक ही नाव के सवार हैं और दोनों ने हाल के दिनों में काफी प्रगति की है।

नवीनतम घटनाक्रम में अमेरिकी एंटी मिसाइल सिस्टम की तैनाती पर मतभेदों के काफी हद तक व्यवस्थित होने के बाद चीन और कोरिया गणराज्य के द्विपक्षीय संबंध भी सुधरे हैं। कोरिया के विदेश मंत्री इस सप्ताह बीजिंग के आधिकारिक दौरे पर भी हैं। रूसी राष्ट्रपति ने भी कोरियाई परमाणु मसले पर अमेरिकी राष्ट्रपति से बात की है। ये कुछ कूटनीतिक प्रयास हैं, जिन्हें महसूस किया जाना चाहिए। बाकी पक्षों का भी इसी दिशा में सोचना सकारात्मक होगा। (चाइना डेली, बीजिंग से साभार)

(साई फीचर्स)



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