अर्थनीति में बदलाव चाहता है संघ

(अवधेश कुमार)

बीजेपी और मोदी सरकार के भीतर इस समय नीतियों और कामकाज को लेकर मंथन चल रहा है। पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने सरकार के अर्थ संबंधी फैसलों पर सवाल उठाए। हालांकि उनकी कुछ बातें सच होते हुए भी अपने लेख में वे एक अर्थशास्त्री से ज्यादा राजनेता ही दिखे। उसमें निशाना वित्त मंत्री अरुण जेटली पर था। जेटली ने जो जवाब दिया, वह भी विषय के बजाय व्यक्ति केंद्रित हो गया, जिससे तू-तू-मैं-मैं की स्थिति बनी। उसके बाद यशवंत सिन्हा को भी प्रतिक्रिया देनी पड़ी। दोनों के वाकयुद्ध ने बड़ा अप्रिय दृश्य उत्पन्न किया। मोदी सरकार के गठन के इन तीन वर्ष पांच महीनों में पार्टी के अंदर ऐसा विवाद कभी नहीं हुआ था। प्रधानमंत्री या बीजेपी अध्यक्ष ने इसका कोई जवाब नहीं दिया, अन्यथा यह और ज्यादा कटु हो जाता। आम धारणा यही है कि अरुण जेटली को या तो जवाब नहीं देना चाहिए था, या देना भी था तो वित्त से जुड़े पहलू पर फोकस करना चाहिए था। सच कहें तो मीडिया और बीजेपी विरोधियों के लिए यशवंत सिन्हा की बातों का चाहे जितना महत्व हो, सरकार और बीजेपी के लिए यह आई-गई जैसी बात है।

सरकार से संतुष्ट

संघ की स्थापना के अवसर यानी विजयादशमी के वार्षिक संबोधन में सर संघचालक मोहन भागवत ने भी अर्थनीति को लेकर कुछ बातें कही हैं। सरकार या बीजेपी उसे उस तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती, जिस तरह यशवंत सिन्हा की बातों को किया। भागवत ने देश के समक्ष उपस्थित सारे ज्वलंत मुद्दों पर अपनी बातें रखीं, जैसा वार्षिक संबोधनों में होता है। उन्होंने कहा कि गोरक्षा को धर्म से न जोड़ें। उन्होंने गोरक्षा के नाम पर हिंसा का विरोध किया और हिंसा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का भी पक्ष लिया। डोकलाम विवाद को सम्मानजनक तरीके से निपटाने के लिए सरकार की प्रशंसा की। कश्मीर में सुरक्षा बलों को पूरी आजादी देने से आतंकवाद की कमर टूटने की बात भी कही। रोहिंग्या मुद्दे पर भी उन्होंने संघ का रुख स्पष्ट किया कि उनको यहां रहने की अनुमति देने के बाद देशवासियों के लिए रोजगार के अवसर कम होंगे और सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ेगा। यह सरकार की नीतियों का ही समर्थन था। कुल मिलाकर लगा कि मोहन भागवत ने सरकार की पीठ बड़े अच्छे से थपथपाई है।

उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर ज्यादा बातें कहीं जो सुझाव के रूप में थीं। उनका कहना था कि आर्थिक नीतियां बनाते समय जनता से फीडबैक अवश्य लिया जाए। आज तक किसी सरकार ने जनता से फीडबैक लेकर आर्थिक नीतियां नहीं बनाईं। 1991 में भारत की अर्थनीति बदली गई तब भी जनता या उनके प्रतिनिधि संगठनों से विचार-विमर्श नहीं किया गया। उसके बाद से सारी सरकारें मनमाने तरीके से आर्थिक नीतियां बनाती रही हैं। मोदी सरकार इस सुझाव को किस तरह क्रियान्वित करेगी, यह देखने वाली बात होगी। यह सुनने में जितना आसान है, निभाने में उतना ही कठिन है। संघ परिवार के कई घटक भी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर समय-समय पर सुझाव दे रहे हैं। अभी हाल में बीजेपी ने दिल्ली में एक बड़ी बैठक का आयोजन किया। नाम तो उसे कार्यकारिणी का दिया गया लेकिन उसमें बीजेपी के सारे निर्वाचित जन प्रतिनिधियों तथा प्रमुख कार्यकर्ताओं को बुलाया गया था। जाहिर है, इसका भी कुछ निश्चित उद्देश्य था। इसमें दिए गए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों में कुछ बातें साफ थी। मसलन, शाह ने अगले लोकसभा चुनाव के 350 सीटों के लक्ष्य को पूरा करने के लिए बूथ स्तर तक जाने की योजना दी, तो मोदी ने कार्यकर्ताओं से सरकारी कार्यकमों को जनता से जोड़ने का लक्ष्य दिया।

दोनों के संबोधनों में जनता से सीधे संपर्क की बातें शामिल थीं। जाहिर है, आप पार्टी के प्रचार या सरकार के कार्यक्रमों को लेकर जनता के बीच जाएंगे तो वहां आपको फीडबैक भी मिलेगा। मगर यह फीडबैक सरकार तक पहुंचे और इसका संज्ञान लिया जाए, इसकी प्रणाली क्या होगी? बीजेपी के करीब चार लाख कार्यकर्ता अभी बूथों तक पहुंच रहे हैं। कहा गया है कि कुछ ही दिनों में वे करीब सात लाख बूथों तक पहुंच जाएंगे। क्या वहां से सरकार की नीतियों से संबंधित कुछ फीडबैक भी आ रहे हैं? प्रधानमंत्री का यह कहना सही है कि सरकारी योजनाएं केवल सरकारी मशीनरी तक न रहें और हम केवल चुनाव के समय जनता तक न जाएं, बल्कि लगातार उनको जोड़े रखें। इसी से जनता का फीडबैक मिलेगा, जिससे सरकार अपनी नीतियों में सुधार कर सकती है। प्रधानमंत्री को इस फीडबैक के लिए बाकायदा एक ढांचा बनाने की पहल करनी चाहिए।

जनता की राय

मोहन भागवत की बातों को भी एक तरह से जनता का फीडबैक माना जा सकता है। उन्होंने सीधे-सीधे सरकार की आलोचना नहीं की, लेकिन अगर वे अर्थनीति में बदलाव का सुझाव दे रहे हैं तो साफ है कि उन्हें ऐसा फीडबैक मिला है। उन्होंने ऐसी अर्थनीति की बात की है जिसमें सिर्फ बड़े उद्योगपतियों के फायदे न हों, बल्कि मझोले व छोटे कारोबारियों और किसानों के हितों का भी पूरा ख्याल रखा जाए। उन्होंने अर्थनीति में रोजगार सृजन और उचित पारिश्रमिक को प्राथमिकता देने की बात कही है। मोदी सरकार की अर्थनीति को लेकर चल रही बहस के केंद्र में मुख्यतः ये विषय ही हैं- कृषि, मझोले व छोटे उद्योग और रोजगार। मोहन भागवत ने इन सबका संज्ञान लिया और सार्वजनिक वक्तव्य के माध्यम से सरकार तक पहुंचाया। उम्मीद करें कि सरकार इसे जनता का फीडबैक मानकर इसके अनुरूप बदलाव लाने की कोशिश करेगी। सर संघचालक की बातों को सरकार या पार्टी पूरी तरह नजरअंदाज कर दे, ऐसा तो नहीं हो सकता।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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