इसी ने राहुल गांधी को ज़ीरो बनाया था, यही हीरो बना सकता है

(जावेद अनीस)

शुरुआती हिचक के बाद भारत की राजनीति ने सोशल मीडिया को एक टूल के रूप में अपना लिया है। सभी प्रमुख दलों के नेता अब इस पर नजर आ रहे हैं और इस मोर्चे पर भी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में जुटे हैं। सोशल मीडिया अब नेताओं की एक खास छवि और मुद्रा भी गढ़ रहा है। यह इमेज उन लाखों लोगों के लिए अहम है, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं। साल 2014 में नरेंद्र मोदी की सफलता में इसका बड़ा योगदान था।

कहा गया कि इस माध्यम को साध लेने के कारण ही मोदी को इतनी बड़ी जीत मिली, जबकि राहुल गांधी यहां अपनी नकारात्मक या कमजोर छवि के कारण लोगों की नजर में चढ़ नहीं पाए। बहरहाल, गुजरात विधानसभा चुनाव आते ही राहुल गांधी नए सिरे से सोशल मीडिया पर नमूदार हुए। इस बार यह काम उन्होंने पूरी तैयारी के साथ किया। जिस माध्यम ने 2014 के आगे-पीछे उन्हें पप्पू बना डाला था, आज उसी पर वह सुर्खियां बटोर रहे हैं। आज सोशल मीडिया पर एक नया राहुल ब्रांड आ गया है। इसके असर का अंदाजा गुजरात में उनको मिल रहे रिस्पॉन्स और बीजेपी की बेचौनी को देखकर लगाया जा सकता है।

2014 में मिली करारी हार के बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी। पहले केंद्र और फिर एक के बाद एक सूबों में अपनी सरकारें गंवाने के बाद उसके भविष्य पर ही सवालिया निशान लग गया था। वैसे तो किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव में हार-जीत सामान्य बात है, लेकिन यह हार कुछ अलग थी। कांग्रेस इससे पहले भी हारती थी लेकिन तब उसकी वापसी को लेकर किसी को संदेह नहीं होता था। लेकिन इस बार कांग्रेसी भी अपनी वापसी को लेकर संदेह जताते हुए देखे गए।

इस दौरान दर्जनों बार उनकी री-लांचिंग हो चुकी है। हर बार की री-लॉचिंग के बाद कुछ समय के लिए वे बदले हुए नजर आए, लेकिन इस बदलाव की मियाद बहुत कम होती थी। इधर एक बार फिर उनकी रीब्रांडिंग हुई है और अब वे धीरे-धीरे अपनी छवि एक ऐसे मजबूत नेता के रूप में पेश कर रहे हैं जो नरेंद्र मोदी का विकल्प हो सकता है। उनकी बातों, भाषणों और ट्वीट्स में व्यंग्य, मुहावरे, चुटीलेपन और हाजिरजवाबी का पुट आ गया है जो लोगों को आकर्षित कर रहा है।

इधर परिस्थितियां भी राहुल गांधी को मदद पहुंचा रही हैं। हर बीतते दिन के साथ मोदी सरकार अपने ही वादों और जनता की उम्मीदों के बोझ तले दबती जा रही है। अच्छे दिन, सब का साथ सबका विकास, गुड गवर्नेंस और काला धन वापस लाने जैसे वादे पूरे नहीं हुए हैं। नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों ने परेशानी बढ़ाने का काम किया है।

साफ है कि बदले हुए हालात ने ब्रांडिंग की जमीन तैयार की है। सोशल मीडिया समाज से बहुत अलग सुर नहीं अलाप सकता। हां, समाज की हवा पकड़कर कोई इस पर अपने पक्ष में हवा बना सकता है। कांग्रेस ने इस बार इसमें देर नहीं लगाई। उसे अहसास हो गया है कि गुजरात में माहौल बीजेपी के खिलाफ है। एक बड़ा तबका मोदी-शाह के खिलाफ बातें सुनना चाहता है। जब राहुल उन पर तंज कसते हैं तो गुजरात की पीड़ित जनता को राहत मिलती है। इससे हार-जीत को लेकर निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

आज की स्थिति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सामने चुनौती पिछले 3 सालों में हासिल जमीन को बचाए रखने की है, जबकि कांग्रेस और राहुल पहले ही काफी कुछ गंवा चुके हैं। उनके पास खोने के लिए कुछ खास बचा नहीं है, ऐसे में उनके पास फिर से वापसी करने या विलुप्त हो जाने का ही विकल्प बचता है। इस दौरान घटित दो घटनाएं भी कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए मौका साबित हुई हैं। पहला, पंजाब विधानसभा चुनाव में आप के गुब्बारे का फूटना और दूसरा, नीतीश कुमार का भगवा खेमे में चले जाना।

पंजाब में आप की विफलता से राष्ट्रीय स्तर पर उसके कांग्रेस का विकल्प बन पाने की संभावना क्षीण हुई है। उधर नीतीश कुमार को 2019 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का चेहरा माना जा रहा था, लेकिन उनके पाला बदल लेने से यह जगह पूरी तरह राहुल गांधी के लिए खाली हो चुकी है। कांग्रेस के रणनीतिकार राहुल को कनाडा के युवा और उदारवादी प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो की तरह पेश करना चाहते है, जो दुनियाभर के उदारपंथियों के चहेते हैं। यह एक अच्छी रणनीति हो सकती है क्योंकि नरेंद्र मोदी का मुकाबला उनकी तरह बनकर नहीं, बल्कि सिक्के का दूसरा पहलू बनकर ही किया जा सकता है, जो ज्यादा नरम, उदार, समावेशी और लोकतांत्रिक हो। सतह के नीचे राहुल की छवि अबतक ठीक ऐसी ही रही है। सवाल है कि सोशल मीडिया पर राहुल की यह ब्रांडिंग स्थायी है या अस्थायी? अगर कांग्रेस गुजरात में हार गई तो क्या राहुल की वही पप्पू वाली इमेज फिर वापस लौट आएगी? यही राहुल की परीक्षा है। उन्हें अपनी मौजूदा इमेज बरकरार रखनी होगी।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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