इस पीढ़ी को समझना आसान नहीं है

(संजय कुंदन)

आजकल मिलेनियल जेनरेशन की खूब चर्चा है। उस पर शोध हो रहे हैं, बातें हो रही हैं। कुछ लोग 1980 से 2000 के बीच पैदा हुए युवाओं को इस पीढ़ी का हिस्सा मानते हैं तो कुछ 1990 के बाद पैदा हुए किशोरों को। माना जा रहा है कि आने वाले समय में हमारी जनसंख्या का सबसे बड़ा हिस्सा इसी का होगा और यही देश का सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक भविष्य तय करेगी। हम लोगों ( 45 से 55 वर्ष के बीच) के बच्चे इसी पीढ़ी के हैं। हम दिन-रात परेशान रहते हैं कि हमारे बच्चे ऐसे क्यों हैं? इनका रहन-सहन, सोच, आदतें सब कुछ एकदम अलग हैं। हमने कल्पना भी न की थी कि बच्चे ऐसे भी हो सकते हैं। हमारे जीवन से इनका जीवन बिल्कुल अलग तो है ही, हमारे बाद की एक-दो पीढ़ी से भी ये एकदम अलग हैं। उनके लिए भविष्य ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। यह जेनरेशन वर्तमान को पूरी मस्ती के साथ गुजारना चाहती है। किसी चीज का स्वामी होना उसके लिए बड़ी बात नहीं। अहम है उस चीज का सुविधाजनक उपभोग। वह फ्लैट या गाड़ी बुक कराने के लिए नहीं, छुट्टियों का आनंद लेने के लिए पैसे बचाना चाहती है। किराये का घर और ओला-ऊबर जैसी टैक्सी सर्विस उसे ज्यादा मुफीद लगती है।

दरअसल, उसका वैल्यू सिस्टम बदल गया है। वह मकान और गाड़ी जैसे संपन्नता के पुराने प्रतीकों से आगे निकल चुकी है क्योंकि ये चीजें वह बचपन से ही देख रही है। इस मामले में अब प्रतियोगिता का भाव भी नहीं है क्योंकि ये चीजें हर किसी के पास हैं। अब विशिष्टताबोध के लिए दूसरी चीजें चाहिए। जैसे आईआईटी में चले जाना कोई विशिष्ट बात नहीं है। खास है आईआईटी से निकलने के बाद इंजिनियरिंग की नौकरी छोड़कर खाने का स्टार्टअप खोल लेना। अब महंगे कपड़े का कोई क्रेज नहीं क्योंकि यह तो हर किसी के पास है। हां, गिटार बजाने का क्रेज जरूर है क्योंकि यह अलग इमेज बनाता है। उनके भीतर रिलेशनशिप का मामला भी एकदम अलग है। जितनी तेजी से संबंध बनते हैं, उतनी ही तेजी से टूट भी जाते हैं। हम इसे एक नैतिक या सामाजिक संकट के रूप में देख सकते हैं पर मुमकिन है, यह उनके स्वतंत्र और मुक्त मस्तिष्क के ज्यादा अनुकूल हो। यह अपनी पुरानी पीढ़ी या बुजुर्गों के साथ क्या सलूक करेगी, कहना मुश्किल है। न जाने हमारा बुढ़ापा कैसा कटने वाला है।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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