उड़ रहीं स्कूल चलें हम अभियान की धज्जियां

सड़कों पर भीख मांग रहे नौनिहाल

(मनीष तिवारी)

लखनादौन (साई)। बच्चों को शिक्षित करने, शाला के प्रति लगाव पैदा करने हेतु केंद्र और प्रदेश सरकार के द्वारा भले ही तरह – तरह की योजनाओं का संचालन किया जा रहा हो, पर जमीनी स्तर पर हालात, इससे उलट ही नजर आ रहे हैं। इस साल जून माह में प्रवेशोत्सव मनाये जाने के बाद भी शिक्षा विभाग के अधिकारियों के द्वारा टीन टप्पर, पन्नी बीनने वाले बच्चों की सुध नहीं ली जा रही है।

बच्चों के हाथों में जिस उम्र में कॉपी किताबें होना चाहिये, उस उम्र में अगर बच्चों के हाथ में भीख का कटोरा मिले तो इसे क्या माना जायेगा? इसी तरह का नजारा नगर पंचायत के वार्ड क्रमांक-04 में देखने को मिला। महज छः साल के सुरेश (बदला हुआ नाम) एवं आठ साल की अंजू (बदला हुआ नाम) भीख मांग रहे थे।

इस तरह के और भी अनेक मामले हैं जो जिले भर में देखने को मिल जाते हैं, जहां बच्चों के द्वारा टीन टप्पर और पन्नियां बीनकर अपने परिवार का उदर पोषण किया जाता है। सब पढ़ो सब बढ़ो का ढिंढोरा पीटने वाले शिक्षा विभाग को इन बच्चों की किंचित मात्र परवाह भी प्रतीत नहीं हो रही है।

ज्ञातव्य है कि सिवनी में तत्कालीन अतिरिक्त कलेक्टर टी.इलैया राजा के द्वारा सुबह सवेरे शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ इस तरह के बच्चों की सुध ली गयी थी। पूर्व जिला कलेक्टर भरत यादव के द्वारा भी इस तरह के बच्चों के अध्ययन के लिये प्रयास किये गये थे।

सिवनी जिला मुख्यालय में ही सुबह सवेरे टीन टप्पर बीनते अबोध बच्चों को देखा जा सकता है। महज पांच से दस बारह साल के बच्चे टीन टप्पर बीनकर किस तरह अपने परिवार के मुखिया की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं, यह शोध का ही विषय है। शिक्षा विभाग सहित त्रिस्तरीय पंचायतों के चुने हुए प्रतिनिधि और अधिकारियों का ध्यान भी इस ओर न जाना आश्चर्यजनक ही माना जायेगा।

शिक्षा विभाग हो या आदिवासी विकास विभाग, सालों से इन विभागों में महीने में दो से तीन बैठकों का आयोजन किया जाना आम बात ही प्रतीत हो रही है। आज संचार क्रांति के युग में शासन के दिशा निर्देशों को प्राचार्य अथवा शिक्षकों तक पहुंचाने के लिये बैठकों का आयोजन क्यों किया जाता है, यह किसी की समझ में नहीं आता है। शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि इस तरह की बैठकों की बजाय ईमेल के जरिये निर्देश अगर शालाओं तक भेज दिये जायें तो समय की बचत की जा सकती है।

सूत्रों ने कहा कि जिस तरह जिला प्रमुखों को राजधानी भोपाल में होने वाली बैठकों में यदा कदा ही बुलाया जाता है, शेष समय उन्हें दिशा निर्देश ईमेल के माध्यम से ही दिये जाते हैं। इस तरह जिला प्रमुख अपनी – अपनी पदस्थापना वाले जिलों में ज्यादा से ज्यादा समय दे पाते हैं। इसी तरह अगर प्राचार्य या शिक्षकों की बैठकों के आयोजन की बजाय तहसील या ब्लॉक स्तर पर तैनात अधिकारियों को ही शालाओं में भेजकर प्रगति प्रतिवेदन प्राप्त किया जाये तो इससे परीक्षा परिणामों को भी सुधारा जा सकता है और इससे सड़कों पर टीन टप्पर बीनते बच्चों को शालाओं में भेजने के काम को अंजाम दिया जा सकता है।



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