कब ली जायेगी विकास की सुध!

(लिमटी खरे)
सिवनी जिले का यह दुर्भाग्य है कि लगभग ढाई दशकों से सिवनी में विकास के मामलों को गौड़ किया जाकर देश-प्रदेश की चिंता की जाती रही है। सिवनी की आयरन लेडी सुश्री विमला वर्मा ने जबसे सक्रिय राजनीति से किनारा किया है उसके बाद से सिवनी की सियासी चाल बेढ़ंगी ही हो गयी है।
नब्बे के दशक के आरंभ होने के साथ ही सिवनी का विकास, सिवनी की समस्याएं, रोजगार के साधन, आवागमन के साधन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा व्यवस्थाएं, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार आदि मामलों में सभी ने मौन ही साध लिया। राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर की समस्याओं पर सभी ने अपना ध्यान केंद्रित कर लिया है।
इस मामले में एक प्रसंग का उल्लेख यहाँ लाजिमी होगा। हमने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में लगभग एक दशक तक पत्रकारिता की है। उस दौरान हमारी खबरें और आलेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया में प्रकाशित और प्रसारित हुआ करते थे। एक बार हमने अमर सिंह के द्वारा अमरीका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के एनजीओ में समाजवादी नेता अमर सिंह के द्वारा दिये गये दान के संबंध में आलेख लिया। इस आलेख को जमकर लोकप्रियता मिली।
इसके कुछ दिनों बाद प्रख्यात लेखक वेद प्रताप वेदिक से हमारी मुलाकात इंडिया हेबीटेट सेंटर में एक कार्यक्रम के दौरान हुई। कॉफी की चुस्कियों के साथ उन्होंने आलेख की तारीफ की और यह भी कहा कि बिल क्लिंटन के बारे मेें लिखने से क्या फायदा? अव्वल तो यह खबर बिल क्लिंटन तक पहुँचेगी नहीं और अगर पहुँच गयी व बिल क्लिंटन ने इस पर संज्ञान ले लिया तो आप हीरो बन जायेंगे। मजा तो तब है जब लोकल नेताओं की गलत नीतियों के खिलाफ लिखा जाये, उनकी अच्छी और सकारात्मक बातों को जनता तक पहुँचाया जाये।
हमें उनकी बात जमी। बात सही थी कि हमारा घर गंदा है और हम मोहल्ले और शहर को साफ करने का बीड़ा उठाये हुए हैं। देखा जाये तो सियासी नेताओं को सबसे पहले स्थानीय मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करना चाहिये उसके बाद ही संभाग, प्रदेश और देश की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिये।
सियासी दल यह भूल जाते हैं कि प्रदेश स्तर पर प्रदेश संगठन और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय संगठन कार्यरत हैं। देश-प्रदेश की समस्याओं के लिये आवाज उठाने के लिये वे सक्षम हैं। सिवनी में प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के अनेक अखबार आते हैं चैनल्स भी टीवी पर दिखते हैं। आम जनता तक वह बात पहुँच ही जायेगी, पर स्थानीय समस्याओं पर आवाज कौन बुलंद करेगा? यक्ष प्रश्न यही खड़ा हुआ है।
यक्ष प्रश्न यह भी खड़ा है कि क्या सिवनी जिले के दोनों सांसद बोध सिंह भगत और फग्गन सिंह कुलस्ते जिले की जनता के द्वारा दिये गये जनादेश का सम्मान कर रहे हैं? दोनों ही सांसद भाजपा के हैं। उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाले काँग्रेस के प्रत्याशियों के द्वारा भी मौन ही साधे रखा गया है। और तो और जिला और नगर काँग्रेस भी इस मामले में मौन ही है।
क्या सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश राय और बरघाट के भाजपा के विधायक जनता के द्वारा दिये गये वोट का आदर कर रहे हैं? विपक्ष में बैठी काँग्रेस का मौन तो इसी ओर इशारा कर रहा है कि दोनों ही विधायकों के द्वारा जनता के हितों में काम किया जा रहा है। जनता ही फैसला करे कि क्या ऐसा हो रहा है?
केवलारी के विधायक रजनीश हरवंश सिंह और लखनादौन के विधायक योगेंद्र सिंह काँग्रेस के हैं। उनके द्वारा दोनों क्षेत्रों के साथ ही साथ जिले की समस्याओं के लिये क्या चिंता की जा रही है? अगर नहीं तो भारतीय जनता पार्टी के द्वारा इन विधायकों को आईना दिखाने का प्रयास क्यों नहीं किया जाता है!
हाल ही में भाजपा शासिन नगर पालिका परिषद की अध्यक्ष के द्वारा पालिका के एक कर्मचारी को हटाने की बात पर भाजपा के जिला अध्यक्ष के समक्ष ही यह कह दिया गया कि अगर उन पर दबाव बनाया गया तो वे त्यागपत्र दे देंगी। यह बात अखबारों में प्रकाशित होने के बाद भी नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ने वालीं मानसी आनंद पंजवानी और कोमल जैसवाल ने अब तक अपनी प्रतिक्रिया मीडिया में नहीं दी है। इस मामले में नगर काँग्रेस का मौन भी आश्चर्य से कम नहीं माना जा सकता है।
हाल ही में मुख्य नगर पालिका अधिकारी नवनीत पाण्डेय के द्वारा चुने हुए पार्षदों को भी मिलने के लिये पर्ची सिस्टम लागू किया गया है। इस मामले में भी अब तक किसी की प्रतिक्रिया सामने नहीं आयी है। यहाँ तक कि पार्षदों ने भी अपना मौन नहीं तोड़ा है। देखा जाये तो चुने हुए पार्षदों को कमोबेश हर कदम पर सीएमओ से सलाह मशविरा या मदद की आवश्यकता होती है। एक पार्षद कम से कम दर्जन दो दर्जन बार तो सीएमओ से मिलने जाता ही है। अगर पार्षदों के लिये भी पर्ची सिस्टम लागू कर दिया गया तो पार्षदों का काम करना दुश्वार हो जायेगा।
दरअसल, मिली-जुली सियासत या यूँ कहें कि नूरा कुश्ती के चलते यह सब कुछ संभव हो पा रहा है। सिवनी की फिजाओं में चल रही बयारों में यह भी कहा जा रहा है कि सियासी दलों के नुमाईंदों के द्वारा आपस में मिलकर एक तरह के सिंडीकेट का निर्माण कर लिया गया है। अब सियासतदारों के लिये जानता के हित गौड ही नजर आ रहे हैं। हालात देखकर यही लगता है कि सिवनी के सियासतदारों को यह गुमान हो चला है कि वे नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, दिग्विजय सिंह या अरूण यादव आदि के कद के नेता हैं। वरना क्या कारण है कि सियासतदारों के द्वारा स्थानीय मामलों को छोड़कर लगातार ही देश-प्रदेश की समस्याओं पर अपना ध्यान केंद्रित रखा जाता रहा है।



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