कहां है मलेरिया उन्न्मूलन

 

(शरद खरे)

जून माह को मलेरिया निरोधक माह के रूप में मनाने की विज्ञप्ति स्वास्थ्य विभाग द्वारा सरकारी तौर पर बड़े ही जोर-शोर से जारी की गयी। सरकारी विज्ञप्ति में जून माह में न जाने क्या-क्या किये जाने के दावे किये गये। जून का आखिरी सप्ताह भी बीत गया है पर मलेरिया उन्मूलन के नाम पर कोई ठोस कवायद होती नहीं दिखी।

नब्बे के दशक तक कीट जनित रोगों के लिये एक पृथक से विभाग का संचालन होता था, जिसे राष्ट्रीय मलेरिया उन्नमूलन कार्यक्रम के बतौर संचालित किया जाता था। इक्कीसवीं सदी के आते आते इस विभाग के कर्मचारियों से अन्य बेगार करायी जाने लगी, जिससे इस विभाग के कर्मचारियों का ध्यान मूल काम से भटक गया।

नब्बे के दशक तक शहर सहित जिले के कमोबेश हर कस्बे में मलेरिया विभाग के द्वारा डीडीटी का छिड़काव कराया जाता था। इसके बाद अन्य दवाओं के आने के बाद उनका प्रयोग आरंभ हुआ। याद पड़ता है कि उस दौर में स्टेंसिल काटकर दीवारों पर मलेरिया से बचाव के उपाय पोते जाते थे, जो आज इतिहास की बात हो चुकी है।

देखा जाये तो एनआरएचएम के तहत भारी मात्रा में केंद्रीय इमदाद आती है। एनआरएचएम के तहत कौन-कौन सी योजनाओं और मदों में बीते सालों में कितनी-कितनी राशि व्यय की गयी है इस बारे में स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह मौन ही है। बताते हैं कि एक-एक सेमीनार में उपस्थित श्रोताओं को भी दो सौ रूपये प्रति श्रोता के हिसाब से भुगतान किया जाता है। कुल मिलाकर एनआरएचएम एक दुधारू गाय बनकर रह गयी है, यही कारण है कि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय लंबे समय से लोगों के स्वास्थ्य की ओर ध्यान नहीं दे पाया है।

जून माह का आखिरी दिन है। इस दौरान भी रात या दिन में अटल बिजली योजना जब भी अटक बिजली योजना में तब्दील हो जाती है तब मच्छरों की फौज से बचना लोगों के लिये टेड़ी खीर ही साबित होता है। जाहिर है मच्छरों के शमन के प्रयास नहीं के बराबर ही हो रहे हैं।

वहीं, नगर पालिका परिषद सहित स्थानीय निकायों के द्वारा फॉगिंग मशीन का उपयोग भी नहीं किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि फॉगिंग मशीन की मद में सरकारी राशि का बंदरबांट न किया जा रहा हो। पार्षद इस बात की ताकीद खुद कर सकते हैं कि उनके वार्ड में कब-कब फॉगिंग मशीन को घुमाया गया।

जिले के दो सांसद और चार विधायक भी मानो इस बात से बेपहरवाह ही हैं कि उनके विधानसभा या संसदीय क्षेत्र में नागरिक मच्छरों से हलाकान हैं। कमोबेश हर कस्बे और शहर में मच्छर जनित रोगों से पीड़ितों की खासी तादाद देखने को मिल रही है। जिला मुख्यालय में ही जगह-जगह मच्छरों की फौज लोगों को हैरान परेशान कर रही है।

जिला चिकित्सालय में मच्छरों का लार्वा खाने वाली गंबूशिया मछली के लिये टांके बना दिये गये हैं, पर अधिकारियों की लाल फीताशाही के चलते मछली नहीं आ पायी है। न जाने कितनी लापरवाही बरती जा रही है इस अभियान में, पर जिला प्रशासन को शायद यह सब कुछ दिखायी नहीं दे रहा है।

 



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