कानून ने तो हक दिए हैं, सवाल अमल का है

(राजेश चौधरी)

महिलाओं के अधिकार की बात की जाए तो संपत्ति का अधिकार महत्वपूर्ण है। शादी के बाद पति की संपत्ति में महिला की मिल्कियत नहीं होती, लेकिन पति की हैसियत के हिसाब से महिला को गुजारा भत्ता दिया जाता है। सीआरपीसी, हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू अडॉप्शन ऐंड मेंटिनेंस ऐक्ट और घरेलू हिंसा कानून के तहत गुजारा भत्ते की मांग की जा सकती है।

अदालत गुजारा भत्ता तय करते वक्त पति की सैलरी और उसकी खुद की कमाई को आधार बनाती है। अगर पति-पत्नी में तलाक हो जाए तो तलाक के समय जो मुआवजा राशि तय होती है, वह भी पति की सैलरी और उसकी अर्जित संपत्ति के आधार पर ही तय होती है।

पति ने कोई विल बनाई है तो उसके मरने के बाद पत्नी को उस विल के तहत संपत्ति में हिस्सा मिलता है, लेकिन पति अपनी खुद की अर्जित संपत्ति की ही वसीयत कर सकता है। वह अपनी पैतृक संपत्ति की पत्नी के फेवर में विल नहीं कर सकता। अगर पति ने कोई विल नहीं बनाई है और उसकी मौत हो जाए तो पत्नी को उसकी खुद की अर्जित संपत्ति में हिस्सा मिलता है। पति की पैतृक संपत्ति में महिला का उसके जीते जी अधिकार नहीं है, लेकिन पति की मौत हो जाए तो महिला को पति की पैतृक संपत्ति में उतना हिस्सा मिलता है, जितना पति का हिस्सा तय है। महिला को यह भी अधिकार है कि वह ससुराल की शेयर्ड हाउस होल्ड प्रॉपर्टी में रह सकती है। वहां से उसे नहीं निकाला जा सकता।

शादी के वक्त जो उपहार और जेवर लड़की को दिए गए हों, वे स्त्रीधन कहलाते हैं। इसके अलावा लड़के और लड़की दोनों को कॉमन यूज के लिए जो फर्नीचर, टीवी या दूसरी चीजें दी जाती हैं, वे भी स्त्रीधन के दायरे में रखी जाती हैं। स्त्री धन पर लड़की का पूरा अधिकार है और इसे दहेज नहीं माना जाता।

लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को डीवी ऐक्ट के तहत प्रोटेक्शन मिला हुआ है यानी डीवी ऐक्ट के प्रावधानों के तहत उन्हें मुआवजा आदि मिल सकता है। ऐसे रिश्ते में रहने वाली महिला को घरेलू हिंसा कानून के तहत प्रोटेक्शन मिला हुआ है। ऐसे संबंध में रहते हुए उसे राइट टु शेल्टर भी मिलता है। यानी जब तक यह रिलेशनशिप कायम है तब तक उसे जबरन घर से नहीं निकाला जा सकता।

महिलाओं को पहले मायके की पुश्तैनी संपत्ति में बराबरी का अधिकार नहीं था। लेकिन 2005 में कानून में हुए बदलाव के बाद महिलाओं को मायके की संपत्ति में भी बराबरी का अधिकार मिला। बेटियों को बेटों की तरह बराबरी का अधिकार मिला। इसके तहत वह पिता की संपत्ति और पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सेदार बनी। सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट एमएल लाहौटी के मुताबिक बेटी न सिर्फ कृषि की जमीन या जायदाद में बराबरी की हकदार बनी बल्कि मायके के घर में भी उसे अधिकार दिया गया। पिता ने अगर खुद संपत्ति अर्जित की है और मरने से पहले उनकी कोई वसीयत नहीं है तो उसके बाद जब उक्त संपत्ति का बंटवारा होगा तो बेटी को भी उतना ही हिस्सा मिलेगा जितना बेटे को मिलेगा।

2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली में सबसे बड़ी फीमेल मेंबर भी कर्ता हो सकती है। संयुक्त हिंदू परिवार में कर्ता का दर्जा सबसे ऊपर होता है और वह परिवार के हित में संपत्ति को मैनेज करता है और तमाम रीति रिवाज निभाता है। कानून द्वारा दिए गए इन तमाम अधिकारों पर अमल सुनिश्चित करने की राह में एक बड़ा रोड़ा है समाज में प्रचलित सोच। कानून की मदद से ही सही, पर इस सोच में बदलाव पर जोर देकर ही महिलाओं की जिंदगी बेहतर की जा सकती है।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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