काम छोड़कर आराम फरमाएं इतिहासकार

(विष्णु नागर)

प्रधानमंत्री ने तक्षशिला को भारत में बताकर इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं, भूगोलशास्त्रियों और राजनीति विज्ञान के विद्वानों के सामने पद पर आते ही अच्छे दिनों को एक चुनौती की तरह फेंक दिया था, जिसे वे लोक नहीं पाए। वह चुनौती प्रतिदिन बड़ी और बड़ी होकर सामने आ रही है। उसकी आग पद्मावती तक पहुंच चुकी है और आगे की यात्रा चालू आहे। प्रधानमंत्री ने उसी दिन, उसी क्षण इतिहासकारों आदि को बता दिया था कि ऐ, तुम अब आराम करो, अब मोदी आ गया है। इतिहास लेखन, ज्ञान-अध्ययन वगैरह सब फालतू काम हैं जिसे उनसे बेहतर संघ कर सकता है और वह करता आ रहा है। वह स्वयं भी प्रधानमंत्रीगीरी करते हुए संघ की शिक्षा के आधार पर ही उससे भी बेहतर ढंग से कर सकते हैं। वैसे भी तुम्हारा यह ज्ञान किस काम का, जो देश के प्रधानमंत्री के इस कथन से सहमति तक व्यक्त न कर सके कि तक्षशिला भारत में है।

जो ज्ञान-विज्ञान इतना पोच हो, वह अज्ञान की श्रेणी में आता है क्योंकि वैसे भी ज्ञानी उसे कहते हैं, जो संघ द्वारा दीक्षित-प्रशिक्षित हो या उसी टाइप हो। अगर पिछले 65 वर्षों में इतिहास की यह दशा और दिशा हो चुकी है तो सॉरी यह काम भी कुछ रिस्क लेकर वह स्वयं कर लेंगे। वैसे भी हजार-दो हजार इतिहासकार आदि निम्न श्रेणी के फर्जी बुद्धिजीवियों को छोड़कर जिसके साथ देश की सवा सौ करोड़ जनता हो, वह हनुमान की तरह सब कुछ कर सकता है। इतिहासकार अब आराम फरमाएं और समझें कि उनके लिए अच्छे दिन का मतलब यही है और मुझे अपना काम करने दें। उसमें साधक नहीं बन सकते तो बाधक भी न बनें। आप लोग अगर आराम भी नहीं फरमा सकते, ज्ञान दिखाए बिना आपको चौन नहीं हो तो हम आपको पाकिस्तान भेज-धकेल सकते हैं। मोदीजी ने जिस इतिहास-यज्ञ में प्रधानमंत्री के नाते अपनी पहली आहुति डाली थी, वह पंचवर्षीय महायज्ञ जारी है। सवा सौ करोड़ आहूतिवाले इस यज्ञ का समापन अगर 5 साल में नहीं हो सका तो यह 10 साल तक चलेगा-अविरल। अब लगभग हर व्हाट्सेपिया,हर फेसबुकशास्त्री, हर ट्विटर विशेषज्ञ के साथ हर बीजेपी सदस्य-संघी-विश्व हिंदू परिषद का नेता, हर जाति का नेता, हर धर्म का पुजारी, मौलवी वगैरह सब के सब इस महायज्ञ में समिधा डालते-डालते इतिहासज्ञ का दर्जा पा चुके हैं।

मराठा सेना हो, राजपूत सेना हो, ब्राह्मण सेना हो, आजकल इसी महायज्ञ में मनोयोग से लगी हुई हैं। आजकल जिधर देखो, उधर यही इतिहास-यज्ञ चल रहा है। दीपिका पादुकोण और भंसाली की बलि लेने के उपरांत जो आग भड़केगी, उसमें इतिहास के संघी-जातिवादी गुटके के सारे दुश्मनों की बलि ली जा सकती है। सावधान और विश्राम नहीं। प्रफेशनल इतिहासकार आजकल इतिहास में प्रधानमंत्री से लेकर तमाम सेनाओं-संगठनों की ऐसी विकट जन भागीदारी देखकर सन्न हैं, धन्य हैं, चकित-थकित-भ्रमित-स्तंभित-पुलकित-विचलित-विगलित-गलित-उबलित सबकुछ हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें और क्या न करें और न करें तो फिर क्या करें। ये इतिहासकार तो बरसों लगाकर टुटरुटूं चार-पांच सौ पेज की बस एक ठो किताब लिखते हैं, ऐसी सैकड़ों किताब लिखने के साथ ही इतिहास बनाने के प्रकरण का निपटारा ये रणबांकुरे मिनटों में कर देते हैं।

इतिहासकार जब तक लिखकर अपनी किताब छपवाते हैं, तब तक ये इतिहास को बुलेट ट्रेन की गति से ऐक्सिडेंट कराते हुए जाने कहां से कहां ले जाते हैं। इतिहास खुद भी इस गति से चलना सीख नहीं पाया है। वह मंद गति से चलना ही जानता है, इसलिए बेचारा जल्दी हांफ जाता है, त्राहिमाम करने लगता है लेकिन यज्ञ हो रहा है तो करने वाले को पसीना भी आता है, आंखें भी उसकी धुएं से जलती हैं, पेट भी गुड़गुड़ करता है, जल-मल विसर्जन निपटाना तक कई बार यज्ञकर्ता का कठिन हो जाता है। यज्ञकर्ता अगर इतना सह सकता है तो घोंचू इतिहास इतना भी सह नहीं सकता।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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