कैसे रूकें मौत के कुंए!

(शरद खरे)

सिवनी जिले का यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जिले में जिले के प्रशासनिक प्रमुख के आदेशों को उनके ही मातहत अधिकारी कर्मचारियों के द्वारा हवा में उड़ा दिया जाता है। जिला प्रमुख के आदेश (वह भी समय सीमा निर्धारित करने वाले) के परिपालन में अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा क्या कार्यवाही की गयी, यह भी शायद ही कोई जानता हो।

इस तरह के एक नहीं अनेकों मामले प्रकाश में आ चुके हैं। ताजा मामला खनिज विभाग से संबंधित है। सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार और सरकार का पक्ष रखने के लिये अधिकृत जिला जनसंपर्क कार्यालय के द्वारा 29 फरवरी 2016 को जारी सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया था कि तत्कालीन जिला कलेक्टर धनराजू एस. के द्वारा जिले के 155 क्रॅशर्स के भौतिक सत्यापन के लिये खनिज विभाग को दो माह की समय सीमा तय कर प्रतिवेदन जमा करने के लिये आदेशित किया गया था।

उस आदेश को दिये हुए 21 माह बीत चुके हैं पर मीडिया को यह नहीं बताया गया है कि तत्कालीन जिला कलेक्टर धनराजू एस. के आदेश के परिपालन में खनिज विभाग के द्वारा क्या कार्यवाही की गयी है। जिले में खनिज विभाग से अगर जानकारी लेने का प्रयास किया जाता है तो यह आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा है, वहीं जिला जनसंपर्क कार्यालय के द्वारा 29 फरवरी 2016 के बाद आज तक इस मामले में प्रशासन का पक्ष नहीं रखा गया है जिससे यही माना जा सकता है कि तत्कालीन जिला कलेक्टर धनराजू एस. के आदेश को खनिज विभाग के द्वारा हवा में ही उड़ा दिया गया।

जिले में 155 क्रॅशर (29 फरवरी 2017 की सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार) हैं और इनके द्वारा सरकार के द्वारा बनाये गये नियम कायदों का पालन किस तरह सुनिश्चित किया जा रहा है इस बात पर भी स्नातकोत्तर उपाधि पाने वाले शोध कर सकते हैं। यह विषय भी पीएचडी का एक विषय हो सकता है।

जिले में न जाने कितने स्थानों पर सीना छलनी कर पत्थर निकालने के बाद बड़े-बड़े गड्ढों में भरा पानी मौत के कुंओं से कम नहीं है। इस तरह के असुरक्षित कृत्रिम तालाबों में अब तक न जाने कितने लोगों और मवेशियों सहित जंगली जानवर काल कलवित हो चुके होंगे।

यक्ष प्रश्न यही अनुत्तरित खड़ा है कि जिलाधिकारी के आदेश का पालन सुनिश्चित कौन करायेगा? क्या जिलाधिकारी सिर्फ आदेश जारी कर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री करते रहे हैं? क्या उन्होंने कभी अपने कार्यकाल में दिये गये आदेशों में से कितने आदेशों का किस तरह पालन हुआ है? यह देखने की जहमत उठायी है? क्या इसके लिये किसी अधिकारी को पाबंद किया गया है कि वह इन आदेशों के पालन पर नजर रखे?

अगर इन सब प्रश्नों का उत्तर हाँ में है तो यह बहुत ही उत्तम बात है, किन्तु अगर उत्तर हाँ में ही है तो फिर इस तरह की अनियमितताएं और अराजकताएं क्यों नजर आ रहीं हैं? अगर उत्तर न में है तो फिर इस तरह के आदेश जारी करने का क्या औचित्य जिनका पालन ही सुनिश्चित न हो पाये!

आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि इस तरह की खबरों के मीडिया में आने के बाद जिले के दो सांसद बोध सिंह भगत एवं फग्गन सिंह कुलस्ते के अलावा चारों विधायक भाजपा के कमल मर्सकोले, निर्दलीय दिनेश राय एवं काँग्रेस के रजनीश हरवंश सिंह एवं योगेंद्र सिंह लगातार ही मौन कैसे हैं!



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