क्या स्वामी नारायणानंद तीर्थ शंकराचार्य हैं : राजेंद्र नेमा

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। स्वामी नारायणानंद तीर्थ दण्डी सन्यासी हैं। इस रूप में वे सम्मान के पात्र हैं, पूज्य हैं किन्तु उनके अनुयायी एवं वे स्वयं को शंकराचार्य कह रहे हैं यह वैदिक सनातनधर्म, भगवत्पाद आद्यशंकराचार्य द्वारा स्थापित चतुष्पीठ परम्परा तथा उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश – निर्देश का अपमान है जो धर्म एवं न्यायसंगत नहीं है। स्वामी नारायणानंद तीर्थ द्वारा अपने अनुयायियों को स्पष्ट किया जाना चाहिये कि वे दण्डी सन्यासी हैं। काशी धर्मपीठाधीश्वर हैं, किन्तु शंकराचार्य नहीं हैं अपितु शंकराचार्य के अनुयायी हैं तथा अपने वाहन से, मंच पर लगे फ्लेक्स, बैनरों से तथा भक्तों द्वारा लगाये गये जयकारे से शंकराचार्य शब्द हटाने का निर्देश देना चाहिये।

इस आग्रह के साथ उनसे निवेदन करते हुए वैदिक सनातन संस्कृति के प्रखर प्रवक्ता, आध्यात्मिक पत्रिका गुरूरत्नेश्वरधाम के सम्पादक राजेन्द्र नेमा क्षितिज ने कहा है कि यह अत्यंत अप्रिय होगा कि शंकराचार्य के शिष्यों एवं भक्तों को उन पर न्यायिक कार्यवाही करने हेतु विवश होना पड़े।

राजेन्द्र नेमा ने इस बात पर खेद व्यक्त किया है कि आज वैदिक सनातन धर्म और भारतीय सनातन संस्कृति पर चारों और से प्रहार किये जा रहे हैं। उसे अपने मूल सिद्धांतों से भटकाया जा रहा है तथा उसे मत-मतान्तरों में विभाजित तथा विखण्डित किया जा रहा है, कुकुरमुत्ते की तरह ऊग रहे पाखण्डी बाबाओं एवं फर्जी शंकराचार्यों के द्वारा पाखण्ड एवं अंधविश्वास का मकड़जाल फैलाकर सनातनधर्मी आस्था तथा निष्ठाओं का हरण किया जा रहा है, ठगा जा रहा है। ऐसे में श्रीममन्नारायण का स्वरूप माने जाने दण्डी सन्यासियों का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वे अद्वैत सिद्धांतों का प्रचार कर वैदिक आस्थाओं को पुष्ट कर लोगों में मूल सनातनधर्म के आचार – विचारों का प्रचार करें जिसके लिये उनका किसी अमान्य शंकरापीठ तथा तथाकथित शंकराचार्य होना आवश्यक नहीं है।

उन्होंने कहा कि स्वामी नारायणानंद तीर्थ स्वयं विचार करें कि सनातनधर्म में स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती महाराज, स्वामी कृष्णानंद सरस्वती महाराज, धर्मसम्राट ब्रह्मलीन स्वामी हरिहरानंद सरस्वती (करपात्रीजी) महाराज, स्वामी पूर्णानंद महाराज, स्वामी अखण्डानंद महाराज, जिनका सम्मान चारों तत्कालीन शंकराचार्य करते रहे हैं, वे कहाँ से शंकराचार्य थे। इसी तरह वर्तमान में भी अनेक दण्डी सन्यासी तथा ब्रह्माचारी जन आस्था के केन्द्र तथा वैदिक सनातनधर्म के प्रचार – प्रसार में लगे हैं और जन आस्था के केन्द्र हैं। उक्त समस्त महानुभाव कहाँ के शंकराचार्य रहे हैं और क्या वे जन सम्मान के पात्र नहीं हैं।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वैदिक सनातन धर्मावलम्बी और जिन्हें इतिहास का सामान्य ज्ञान है वे सभी यह जानते हैं कि भगवान श्रीमदाद्यशंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार पीठों की स्थापना की और उनमें अपने चार शिष्यों को अभिषिक्त कर अपना ही रूप माने जाने का निर्देश जनता को दिया था। मठाम्नाय महानुशासन के द्वारा उन्होंने उन्हीं चार पीठों में अभिषिक्त आचार्यगण शंकराचार्य के नाम से जाने जाते हैं। अन्य यदि स्वयं को शंकराचार्य कहते या कहलवाते हैं तो यह जनता के साथ धोखा है।

उन्होंने आगे कहा कि इसी आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि देश में द्वारका, शारदामठ, गोवर्धन (पुरी) मठ, ज्योतिर्मठ तथा श्रृंगेरीमठ ये ही चार मठ हैं, इनके अतिरिक्त यदि कोई स्वयं को शंकराचार्य कहता है उन्हें नकली शंकराचार्य मानकर उन पर सरकार कार्यवाही करे। स्वामी नारायणानंद इन बातों को नहीं जानते होंगे, यह असंभव है। स्वयं को शंकराचार्य कहने कहलवाने वालों को यदि मठम्नाय – महानुशासन का ज्ञान न हो और यदि है तो वह महानुशासन को न माने, उस पर कार्यवाही अवश्य ही होनी चाहिये।

अपनी विज्ञप्ति में राजेन्द्र नेमा क्षितिज ने स्वामी नारायणानंद तीर्थ से यह आग्रह किया है कि वे मठाम्नाय महानुशासन की मर्यादा को मानें तथा उसका पालन करें, ताकि सनातनधर्मी जनता भी अपनी मर्यादा में रहकर उनका दण्डी सन्यासी के योग्य सम्मान करती रहे। वह उनके विरोध में मर्यादा भंग कर आंदोलन आदि के लिये उतारू न हो।



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