क्यों लगे हैं यातायात सिग्नल!

(लिमटी खरे)

शहर की यातायात व्यवस्था बदहाल है। शहर में यातायात नियंत्रित करने के लिये चार साल पहले स्थापित किये गये ट्रैफिक सिग्नल्स आखिर लगाये ही क्यों गये हैं यह बात शहर के नागरिक समझ नहीं पा रहे है। इनमें से जब चाहे तब जिस सिग्नल का मन होता है वह बंद हो जाता है अथवा कर दिया जाता है।

छिंदवाड़ा चौराहे का यातायात सिग्नल कभी बंद कभी चालू रहता है। नगर पालिका के सामने का यातायात सिग्नल लंबे समय ेसे बंद है। कचहरी चौक का यातायात सिग्नल तकनीकि अमले के मशविरे के बिना ही संस्थापित करवा दिया गया लगता है, क्योंकि गणेश चौक से आने वाले को कचहरी जाने वाला सिग्नल दिखायी ही नहीं देता है।

इसके अलावा माधव राव सिंधिया तिराहे से आने वाला शख्स, किस सिग्नल को फालो करे यह समझ में नहीं आता है। कचहरी की ओर से आने वाला किस सिग्नल को देखकर आगे बढ़े यह भी एक पहेली से कम नहीं है। कुल मिलाकर सब कुछ गड़बड़झाला ही नजर आता है।

सर्किट हाऊस चौराहे पर स्थापित यातायात सिग्नल जब चाहे तब बंद हो जाता है। इस सिग्नल से होकर रोज ही जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन के अधिकारी गुजरते हैं। रही बात बाहुबली चौराहे के यातायात सिग्नल की तो वह लगभग एक पखवाड़े से ज्यादा समय से ही बंद पड़ा है। अगर इन सिग्नल्स को नियमित तौर पर चालू नहीं कराना था तो नगर पालिका परिषद के द्वारा जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को इस तरह हवा में उड़ाने की इज़ाजत पालिका के प्रतिनिधियों को किसने दी?

ये सारे के सारे यातायात सिग्नल किशन सिंह ठाकुर के मुख्य नगर पालिका अधिकारी रहते हुए संस्थापित किये गये हैं। इन यातायात सिग्नल्स में निश्चित तौर पर कमीशन का लंबा खेल खेला गया होगा। इन सिग्नल्स का भौतिक सत्यापन किस इंजीनियर ने किया, किसके द्वारा इसके भुगतान की अनुशंसा की गयी? यह बात भी देखने की जरूरत है।

नगर पालिका की पिछली परिषद के द्वारा दिसंबर 2013 में इन यातायात सिग्नल्स को लगवाया गया था। 2013 के बाद अगर ये सिग्नल्स सही तरीके से नहीं चल पा रहे हैं तो इसके लिये तत्कालीन मुख्य नगर पालिका अधिकारी किशन ंिसंह ठाकुर ही पूरी तरह उत्तरदायी हैं।

नयी परिषद को चाहिये कि वह किशन सिंह ठाकुर के कार्यकाल के इन सिग्नल्स के लिये शासन को लिखे ओर इसमें व्यय की गयी राशि को ब्याज सहित किशन सिंह ठाकुर से वसूल कर शासन के खजाने में जमा कराये, किन्तु वर्चस्व की जंग में उलझी नगर पालिका परिषद को मानो भ्रष्टाचार से लड़ने की फुर्सत ही नहीं रह गयी है।

वर्तमान नगर पालिका परिषद के कार्यकाल के तीन साल पूरे हो गये हैं। तीन सालों में भी भाजपा शासित नगर पालिका परिषद अगर शहर में लगभग तीस लाख रूपये की राशि से संस्थापित यातायात सिग्नल्स को करीने से आरंभ नहीं करवा पायी है तो यह चुने हुए प्रतिनिधियों के लिये शर्म की ही बात मानी जा सकती है।

शहर के यातायात सिग्नल्स को करीने से संचालित क्यों नहीं करवाया पा जा रहा है, इस मामले में पालिका के पास कोई ठोस वजह नहीं है। सीएम हेल्प लाईन में भी पालिका के द्वारा अनाप-शनाप जवाब देकर शिकायत को बंद करवा दिया जाता है। इस तरह शासन के नियम कायदों का खुलेआम मजाक सिवनी में उड़ता दिखता है और सांसद-विधायक सहित प्रशासन को देखकर लगता है कि वह नीरो के मानिंद चैन की बंसी ही बजा रहा है।

पालिका के कारिंदों से अगर पूछा जाता है तो उनके पास रटा रटाया जवाब होता है कि अभी चौक-चौराहों का विस्तारीकरण चालू है। विस्तारीकरण के बाद यातायात सिग्नल को आरंभ कराया जायेगा। यक्ष प्रश्न यही है कि अगर विस्तारीकरण अधूरा है तो विस्तारीकरण के बाद ही इन सिग्नल्स की संस्थापना के काम को अंजाम दिया जाना चाहिये था। चार साल साल पहले तीस लाख रूपये की राशि व्यय करने का आखिर औचित्य क्या था?

चौक-चौराहों पर यातायात पुलिस के स्टॉपर रखकर यातायात को नियंत्रित किया जा रहा है। कुल मिलाकर शहर में नगर पालिका के कदमताल ठीक नहीं माने जा सकते हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि पालिका की इस बेढंगी चाल को देखने-सुनने के बाद भी स्थानीय विधायक दिनेश राय, सांसद बोध सिंह भगत सहित काँग्रेस और भाजपा संगठन मौन ही साधे हुए हैं। पालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुकीं कोमल जैसवाल और मानसी आनंद पंजवानी ने तो मानो पराजय के बाद नगर पालिका के मामलों से तौबा ही कर रखी है!

एक बात का उत्तर आज तक नहीं मिल पाया है कि आखिर शहर में जो कुछ हो रहा है वह किसके लिये किया जा रहा है? क्या अधिकारियों की मर्जी की बातें ही शहरवासियों पर थोपी जाती रहेंगी? क्या नागरिकों की सुविधा और मंशा को कोई स्थान नहीं दिया गया है प्रजातंत्र में? अगर है तो शहर के निवासियों के लिये कराये जाने वाले कामों में नगर वासियों की मंशा के बारे में किंचित मात्र चिंता तो कर ले नगर पालिका प्रशासन . . .!



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