खाड़ी का संकट

कुछ देशों की अविवेकपूर्ण राजनीतिक चालबाजी की वजह से मध्य-पूर्व में सियासी तनाव गहराता ही जा रहा है, और यह पूरी दुनिया के लिए चिंता की बात है। यही कारण है कि संसार भर के देश लगातार यह अपील कर रहे हैं कि मध्य-पूर्व की सुरक्षा और पूरी दुनिया के हक में भी इस बढ़ते हुए तनाव को रोका जाए।

कतर के उप-प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री एच ई शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने भी हाल ही में वाशिंगटन में बातचीत के दौरान यह ध्यान दिलाया था कि इस इलाके के कुछ देश अन्य देशों पर अपनी धौंस-पट्टी जमाना चाहते हैं, इसी वजह से मध्य-पूर्व में अस्थिरता की स्थिति पैदा हो रही है।

बीते 5 जून को बगैर किसी आधार के कतर पर पाबंदियां थोपने के बाद सऊदी अरब और यूएई अब अपने एजेंडे पर आगे बढ़ रहे हैं। ये देश जमीनी हकीकत से अपनी आंखें मूंदे हुए हैं। कतर के खिलाफ उनका जैसा आचरण रहा, उसे ही अब वे लेबनान में भी दोहरा रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में चिंता और अराजकता की स्थिति बन रही है। घेराबंदी करने वाले देश अपने अविवेकपूर्ण राजनीतिक कदमों का कोई भी न्यायोचित जबाव दिए बिना एकतरफा कार्रवाई कर रहे हैं।

सऊदी अरब के नेतृत्व में कतर की नाकेबंदी करने वाले देश पिछले छह महीने में अपने आरोपों के पक्ष में एक भी सुबूत नहीं पेश कर पाए हैं। अगर कोई राजनीतिक मतभेद है, तो उसे बातचीत के जरिए सुलझाए जाने की विश्व-बिरादरी की अपील को भी ये देश नजरअंदाज कर रहे हैं और संवाद करने को राजी नहीं हैं।

कतर के उप-प्रधानमंत्री ने यह दुरुस्त फरमाया है कि नाकेबंदी करने वाले देश क्षेत्रीय सुरक्षा व स्थिरता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और अपने नागरिकों की जिंदगी को दांव पर लगा रहे हैं।और यह सब उस वक्त हो रहा है, जब यह पूरा इलाका दुनिया की मदद से दहशतगर्दी के दैत्यों के खिलाफ जंग में जुटा है। इसलिए यह महाशक्ति देशों का फर्ज बनता है कि वे घेराबंदी करने वाले इन देशों की क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाने वाली गतिविधियों पर लगाम लगाएं और बातचीत के जरिए राजनीतिक मतभेदों को दूर करने की सूरत बनाएं। (द पेनिन्सुला, कतर से साभार)

(साई फीचर्स)



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