खिलजी को चित्तौड़ पर हमले के लिए किसने उकसाया?

(डॉ. सामबे)

पद्मावती को जौहर की जरूरत क्यों पड़ी? जौहर की नौबत क्यों आई? वह कौन गद्दार था, जिसने भारत में तुर्क सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को चित्तौड़ पहुंचाया?

इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए मैंने किसी मार्क्सवादी, समाजवादी और सेकुलरवादी लेखकों की किताबों को नहीं पलटा। बल्कि संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार से प्रभावित लेखक तेजपाल सिंह धामा की खोजपूर्ण तथ्यों पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास- अग्नि की लपटें अर्थात् महारानी पद्मिनी के आत्मबलिदान की गौरवगाथा का अध्ययन किया। इस बार उसी के आधार पर चर्चा करेंगे।

हिंदी साहित्य सदन, नई दिल्ली-5 से सन् 2009 में यह किताब प्रकाशित हुई है। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय की टिप्पणी है कि श्री धामा का साहित्य दशकों के गहन अध्ययन का परिणाम है। लेखक की अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं- मनुर्भव अर्थात् विजयी विश्व हिंदुत्व हमारा, गौ का गौरव, पृथ्वीराज चौहान, एक पराजित विजेता, श्री रामसेतु निर्माण और अखंड आर्यावर्त आदि आदि।

उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर श्री धामा की किताब में है। चित्तौड़ राज्य का राष्ट्रीय ब्राह्मण था- राघव चेतन। वह ब्राह्मण से बौद्ध भिक्षु बना और फिर उसकी घर वापसी हुई। वह फिर ब्राह्मण बनकर चित्तौड़ का राष्ट्रीय ब्राह्मण बना। वह रानी पद्मावती के सौंदर्य से अभिभूत था और उसे पाने की लालस उसके मन में थी। मगर उसकी अभिलाषा पूरी नहीं हुई।

राणा रतन सिंह और रानी पद्मिनी का विवाह उसने ही कराया और दक्षिणा में सवा मन सोना मांगा। दक्षिणा को लेकर राणा और राघव चेतन में तकरार हुई। ब्राह्मण को मान और दान के बदले अपमान मिला। वह बदले की आग में जलने लगा। वह चित्तौड़ छोड़कर दिल्ली तुर्क सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में शरण पाने के लिए चला गया। राघव चेतन खिलजी के दरबान आलीजाह तुर्क सुल्तान से कहता है कि अपने जहांपनाह से कहो कि राघव चेतन नामक एक ब्राह्मण आपसे मुलाकात करना चाहता है। (पृ0 58/अग्नि की लपटें)

राघव चेतन अलाउद्दीन के दरबार में हाजिर होता है और कहता है, शहंशाह-ए- हिंद की फतह हो।

खिलजी- काफिर! फतह तो हम कर चुके हैं।

राघव चेतन- माफ करें शहंशाह. . . रणथम्भौर, चित्तौड़, जलौर,देवगिरि और जैसलमेर पर अभी भी शान के साथ भगवा ध्वज लहरा रहे हैं। इन राज्यों में ऐसे खजाने हैं, जिनको पाने के लिए देवदूत भी तरसते हैं। आपने कभी जन्नत की हूरों को देखा है? देवगिरि की राजकुमारी बीरमति, जैसलमेर की राजकुमारी रत्नावती, रणथम्भौर की राजकुमारी देवलदेवी ऐसी ही हूर की परियां हैं और चित्तौड़ में तो . . . चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी विश्व की सबसे सुंदर औरत हैं। इतनी सुंदर और कोमल हैं कि यदि अमावस्या की रात में बाहर निकल जाती हैं तो उसके शरीर के नूर से चारों ओर दिन-सा निकल जाता है। उनके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों की तरह कोमल हैं। पतली कमर, नीली-नीली आंखें और गोरा-गोरा मुखड़ा इतना आकर्षक लगता है कि देखने वाला देखता ही रह जाए। रूप की ऐसी रानी यदि आपके हरम में आ जाए तो आपको यहीं पर जन्नत नसीब हो जाए।

खिलजी- आप सच कह रहे हैं बिरहमन! (पृ0 59/अग्नि की लपटें)

चित्तौड़ का ब्राह्मण राघव चेतन एक ड्रीम सीक्वेंस लेकर तुर्क सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में जाता है और वही ड्रीम सीक्वेंस खिलजी की आंखों में डाल देता है। आज का सूरत-ए-हाल देखकर हैरानी होती है कि इस किताब पर कोई विवाद नहीं हुआ। बेचारा संजय लीला भंसाली! मारे गए गुलफाम। अमीर खुसरो ने पूरा युद्ध देखा था और लिखा है कि केवल एक दिन में तीस हजार राजपूत मारे गए थे। चित्तौड़ का खलनायक अगर खिलजी था तो राघव चेतन को क्या कहेंगे? इनके लिए कौन से विशेषण की खोज करेंगे?

राणा रतन सिंह जैसे प्रेमी और पद्मावती जैसी प्रेमिका के बीच में खलनायक खिलजी के आने का ख्वाब और ख्वाहिशों का नाकाम होना एक सच्चे प्रेम की कथा के महत्व को स्थापित करता है। किन्तु, जायसी जैसे धार्मिक दुराग्रहों से बाहर निकले कवि के अमर महाकाव्य को धार्मिक दुराग्रहों में घसीटने का काम हो रहा है, जो शुभ नहीं है। इतिहास का सच एकांगी नहीं होता।

अंत में, श्री धामा लिखते हैं- रावल रतन सिंह की मदहोशी, राघव चेतन की गद्दारी और अलाउद्दीन की कामुकता ने मिलकर देश में ऐसी आग लगाई कि सारा देश ही अग्नि की लपटों में झुलसने लगा। (पृ0 112/अग्नि की लपटें) इन तथ्यों के आलोक में इतिहास की कौन सी तस्वीर सामने आती है इस पर भी विमर्श होना चाहिए।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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