गाजर घास से पट गया समूचा शहर

पालिका को नहीं गाजर घास उन्नमूलन की चिंता

(अय्यूब कुरैशी)

सिवंनी (साई)। बारिश के मौसम के बीतने के बाद शहर के अनेक हिस्सों में गाजर घास जमकर ऊग चुकी है। गाजर घास के कारण इसके संपर्क में आने से लोगों को चर्मरोग और खुजली जैसी बीमारियां हो रही हैं, जिससे नागरिक हलाकान हैं। उधर, नगर पालिका प्रशासन को गाजर घास के शमन हेतु किसी तरह की चिंता दिखायी नहीं दे रही है।

शहर के रिक्त पड़े मैदानी हिस्सों, खाली प्लाट आदि में इन दिनों गाजर घास बहुतायत में दिख रही है। गाजर घास के कारण दूर से तो प्लाट हरा-भरा दिखता है किन्तु जैसे ही करीब जाकर देखा जाता है तो गाजर घास के सफेद फूल देखकर लोगों को इससे एलर्जी साफ होते दिखायी पड़ने लगती है।

लोगों का कहना है कि गाजर घास के संपर्क में आने से लोगों को चर्मरोग और खुजली जैसी बीमारी हो रही है। गाजर घास वैसे भी नुकसानदेह ही मानी जाती है। इसमें काफी मात्रा में हानिकारक रसायन भी होते हैं। इस पौधे को विदेशी मूल का माना गया है। जानकारों का कहना है कि इस खरपतवार के लगातार संपर्क में आने से मनुष्यों में डरमेटाइटिस, एक्ज़िमा, एलर्जी, बुखार, दमा आदि की बीमारियां हो जाती हैं।

कहा जाता है कि अस्सी के दशक में अमरीका से लाल गेहूँ का आयात किया गया था। लाल गेहूँ के साथ ही गाजर घास के बीज भी भारत आये और उसके बाद से यह समूचे देश में फैल गया। अस्सी के दशक के पूर्व खाली भूखण्डों में बेशरम के पेड़ बहुतायत में पाये जाते थे, जो आज नदारद ही हो गये हैं। इनका स्थान गाजर घास के द्वारा ले लिया गया है।

गाजर घास को पशुओं के लिये भी खतरनाक बताया गया है। इससे उनमें कई प्रकार के रोग हो जाते हैं एवं दुधारू पशुओं के दूध में तो कड़वाहट तक आने लगती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पशुओं द्वारा अधिक मात्रा में इसे चर लेने से उन पशुओं की मृत्यु भी हो सकती है।

जानकारों का कहना है कि गाजर घास के शमन के लिये कुछ दवाएं भी प्रचलन में हैं, जिनका छिड़काव करने से इसका प्रसार रोका जा सकता है। ये कीटनाशक दवाएं महंगी हैं, इसलिये आम आदमी इसका प्रयोग नहीं कर पा रहा है, किन्तु नगर पालिका के पास इस तरह दवाएं पर्याप्त मात्रा में होने के बाद भी शहर को गाजर घास से मुक्त कराने में पालिका असफल ही साबित होती दिख रही है।



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