घुटना प्रत्यारोपण: प्राइस कैपिंग के बावजूद ‘लूट’ जारी

सिर्फ स्टेंट के साथ ही अस्पताल खेल नहीं कर रहे बल्कि घुटना बदलने यानी नी इंप्लांट की भी प्राइस कैपिंग के बाद प्राइवेट अस्पतालों ने पैकेज का रेट पहले की तुलना में 20 से 30 हजार रुपये बढ़ा दिया है। कैपिंग के बाद नी इंप्लांट सप्लाई करने वाली कंपनियों की तरफ से मिलने वाला कमिशन बंद होने से अस्पतालों ने रेट बढ़ा दिए हैं। सूत्रों का कहना है कि अब देसी और विदेशी सारे इंप्लांट के रेट लगभग बराबर हैं। ऐसे में देसी इंप्लांट से अस्पतालों को ज्यादा कमिशन मिल रहा है और इसी वजह से अस्पताल डॉक्टरों पर देसी इंप्लांट करने का प्रेशर डाल रहे हैं।

खर्च में ज्यादा अंतर नहीं

दिल्ली के एक जाने माने ऑर्थोपीडिक सर्जन ने बताया कि कैपिंग के बावजूद कोई फायदा नहीं हुआ। आज भी दोनों घुटने को बदलने का खर्च बड़े अस्पतालों में लगभग साढ़े 4 लाख रुपये आ रहा है जबकि इससे पहले 4 लाख 75 हजार में इलाज होता था। यहां मरीजों को उतना फायदा नहीं हुआ है। इंप्लांट के रेट कम हुए तो मरीजों से बाकी खर्च के तौर पर अलग से पैसे लिए जा रहे हैं। पैकेज रेट बढ़ा दिए गए हैं। सर्जन ने बताया कि इसके साथ-साथ बेस्ट इंप्लांट भी नहीं हो रहे। डॉक्टर ने कहा कि पहले कंपनियां इंप्लांट के साथ सपॉर्ट में कई दूसरी चीजें देती थीं, जो अब नहीं देती हैं। अगर दे भी रही हैं तो क्वॉलिटी के साथ हेरफेर की जा रही है।

रिविजन का खर्च दो गुना से भी ज्यादा

डॉक्टर ने बताया कि रिविजन का खर्च पहले 1 लाख 70 हजार में हो जाता था, लेकिन कुछ मरीजों में यह अब साढ़े 4 से 5 लाख रुपये तक पहुंच रहा है। डॉक्टर ने बताया कि पहले कंपनियां इंप्लांट के साथ साथ कोन, सीमेंट, स्क्रू आदि फ्री में देती थी, लेकिन 40 हजार का कोन अब 1 लाख 50 हजार में दे रही हैं। कंपनियों ने दूसरे सामान और प्रॉडक्ट्स के रेट भी बढ़ा दिए हैं। पहले सीमेंट के 3 हजार लगते थे, अब कंपनियां सीमेंट नहीं देना चाहती हैं। कुछ मिलाकर आने वाले समय में क्वॉलिटी पर असर पड़ने का खतरा है।

मरीजों में कंफ्यूजन बना हुआ है

डॉक्टर ने कहा कि कंफ्यूजन बना हुआ है। मरीज ऑर्डर की कॉपी लेकर आते हैं और कहते हैं कि ये वाला लगा दो। जब उन्हें हम बताते हैं कि तीन अलग-अलग पार्ट में इंप्लांट होगा फिर तीन चीजें लगती हैं, यह उसका रेट है। मरीज साफ साफ कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने तो कैपिंग कर दी है। ऐसे में तुम्हें तो देना होगा। यही नहीं, मरीजों में यह भी कंफ्यूजन है कि कौन सा इंप्लांट लगवाएं, जब देसी और विदेशी दोनों का रेट बराबर है तो मरीज विदेशी इंप्लांट करने पर जोर देते हैं, जबकि अब अस्पताल प्रशासन अपने डॉक्टरों को देसी इंप्लांट करने का प्रेशर बनाता है क्योंकि यहां पर उन्हें 10 से 15 पर्सेंट तक कमिशन मिल रहा है। यही वजह है कि देसी इंप्लांट का यूज 40 से 50 पर्सेंट बढ़ गया है।

कंपिनयां सपॉर्ट नहीं कर रही हैं

डॉक्टर का कहना है कि सबसे बड़ी परेशानी रिविजन नी ट्रांसप्लांट में देखी जा रही है। उन्होंने कहा कि नी ट्रांसप्लांट में फीमर, टीबिया और प्लास्टिक के कंपोनेंट लगते हैं। सरकार ने सबका रेट अलग-अलग कर दिया है। डॉक्टर का कहना है कि कोई फीमर कोबाल्ट का बनाता है तो कोई टाइटेनियम का। सबका रेट अलग है। तीन अलग-अलग कंपनी का सामान लेकर नी इंप्लांट किया जा रहा है, जो औसतन 55 हजार 200 रुपये पड़ रहा है। लेकिन जब किसी मरीज का नी ट्रांसप्लांट फेल हो जाता है तो दोबारा इंप्लांट में कई सामान और लगते हैं, जिसमें दो रॉड, कोन, वेजेज, स्लीव, स्क्रू, बबल्स आदि शामिल हैं।

डॉक्टर भी इसमें बदलाव चाहते हैं

इस बारे में ऑर्थोपीडिक सर्जन डॉक्टर रमणीक महाजन ने कहा कि फैसला सही है। मरीजों को अच्छी क्वॉलिटी की चीज मिलनी चाहिए। यह फैसला तब तक अच्छा है जब कंपनियां हमें वो सारे इंप्लांट, सपॉर्टिव इंस्ट्रूमेंट और मैन पावर देती रहे। साथ ही साथ सरकार को देखना चाहिए कि सीमेंट, स्लीव, कोन की क्वॉलिटी में कमी न आए। उन्होंने कहा कि रिविजन में कई और सामान लगते हैं जो कैपिंग के ऑर्डर में नहीं हैं इसलिए इस पर फिर से सोचना चाहिए। इस बारे में अपोलो अस्पताल के डॉक्टर यश गुलाटी ने कहा कि पहले डीलर, मिडिल मैन और हॉस्पिटल का ज्यादा फायदा होता था। अब वह नहीं है। लेकिन कैपिंग पूरी तरह से ठीक नहीं है। इसे कई स्लैब में डालना चाहिए था।

(साई फीचर्स)


नोट :ये नुस्‍के आजमाने के पहले जानकार चिकित्‍सक से एक बार मशविरा अवश्‍य कर लें।

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