चार जिलों के लिये सिवनी में है प्रयोगशाला

पीडब्ल्यूडी की टैस्टिंग लैब . . . 02

मोबाईल प्रयोगशाला के जरिये हो रहे वारे न्यारे

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। लोक निर्माण विभाग के अधीन निर्माण सामग्री जाँचने परखने के लिये जिला मुख्यालय में बनायी गयी प्रयोगशाला में सिवनी, छिंदवाड़ा, मण्डला और बालाघाट जिलों में लोक निर्माण विभाग के तहत हो रहे निर्माण कार्यों की निर्माण सामग्री (मेटेरियल) की जाँच की जाती है।

विभागीय सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री कार्यालय के भवन के पीछे वाले भवन में स्थित यह विभागीय प्रयोगशाला लंबे समय से चर्चाओं का केंद्र बनी हुई है। इस प्रयोगशाला में लंबा लेन-देन किये जाने की चर्चाएं भी चल रहीं हैं।

सूत्रों का कहना है कि सिवनी सहित चार जिलों में इस समय लगभग पाँच सौ करोड़ रूपये के निर्माण कार्य लोक निर्माण विभाग के द्वारा कराये जा रहे हैं। इन निर्माण कार्यों की गुणवत्ता परखने के लिये नियमानुसार निर्माण स्थल पर लग रही सामग्री के हिस्से को निकालकर सिवनी लाया जाकर यहाँ अधिकारियों की उपस्थिति में इसका परीक्षण कराया जाना चाहिये।

इस प्रयोगशाला में, सूत्रों ने बताया कि पदस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा यहाँ की मशीनों को एक वाहन में रखकर निर्माण स्थल पर ही ले जाया जाकर वहीं इसका परीक्षण कर उसकी रिपोर्ट तैयार कर दी जाती है जो कि नियमों के हिसाब से उचित नहीं माना जा सकता है।

सूत्रों ने कहा कि इस तरह मोबाईल लेब का प्रावधान विभाग में कहीं भी नहीं होने के बाद भी अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा इस तरह के अनैतिक काम को धड़ल्ले से किया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो इस काम में चार से पाँच अंकों की राशि का लेन-देन भी किया जाता है।

इसके साथ ही सूत्रों ने यह संकेत भी दिये कि वरिष्ठ अधिकारियों की कथित अनदेखी के चलते पिछले कुछ सालों से यह प्रयोगशाला भ्रष्टाचार का केंद्र बन गयी है, जिससे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। लोक निर्माण विभाग के आला अधिकारियों के द्वारा भी इस दिशा में कथित तौर पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

लोक निर्माण विभाग के तहत काम करने वाले ठेकेदारों के द्वारा, सूत्रों ने कहा कि प्रयोगशाला के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ सांठ-गांठ की जाकर निर्माण सामग्री की गुणवत्ता चाहे जो भी हो पर उसकी रिपोर्ट अपने हिसाब से तैयार करवा ली जाती है।

सूत्रों ने कहा कि निर्माण सामग्री के परीक्षण के लिये ठेकेदार को अलग – अलग निर्माण सामग्री के लिये निर्धारित राशि भी जमा कराना होता है, किन्तु ठेकेदारों के द्वारा निर्माण सामग्री के एवज में शासन की मद में राशि भी कम जमा करवायी जा रही है जिससे शासन को राजस्व की हानि हो रही है।

इसी तरह सूत्रों ने कहा कि नियमानुसार संबंधित अधीक्षण अधिकारी (सुपरविजन एथॉरिटी) को निर्माण कार्य पूरा होने पर अंतिम देयक (फाईनल बिल) बनाये जाते समय निर्माण सामग्री की जाँच के लिये प्रयोगशाला के लिये निर्धारित राशि को उस देयक में से काटकर उसे शासन के खाते में जमा करना होता है। सूत्रों ने कहा कि इस मामले की ही अगर जाँच करवा ली जाये तो अधिकारी भी दांतों तले उंगली दबा सकते हैं।



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