चेतावनी दर चेतावनी . . .!

(शरद खरे)

नगर पालिका परिषद में चाहे कोई भी मुख्य नगर पालिका अधिकारी आ जाये पर पालिका की बेढंगी चाल सुधरने का नाम ही नहीं ले पा रही है। भारतीय जनता पार्टी शासित नगर पालिका परिषद के द्वारा नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं देने की चिंता आखिर क्यों नहीं की जा रही है यह शोध का ही विषय मना जा सकता है।

शहर में आवारा जानवरों की भरमार साफ दिखायी देती है। शहर का कोई कोना ऐसा अछूता न होगा जहाँ आवारा कुत्ते, सूअर, मवेशी, गधे आदि अपनी धमक से लोगों को परेशान न कर रहे हों। शहर में आवारा कुत्तों के काटने, अवारा मवेशियों के द्वारा लोगों को घायल करने के न जाने कितने वाकये हो चुके हैं पर इसके बाद भी भाजपा शासित नगर पालिका परिषद अब तक इन आवारा जानवरों को खदेड़ने में नाकाम ही रही है।

कुछ साल पहले तत्कालीन जिला कलेक्टर भरत यादव के द्वारा नगर पालिका को आवारा पशुओं को शहर से हटाने के लिये बार-बार कड़े निर्देश जारी किये गये थे। विडम्बना ही कही जायेगी कि भरत यादव के कार्यकाल में उनके द्वारा जारी किये गये अनगिनत कड़े निर्देशों को यहाँ पदस्थ रहे अधिकारियों के द्वारा हर बार हवा में उड़ा दिया गया था।

इसके बाद आये कलेक्टर धनराजू एस. के द्वारा एकाध बार ही आवारा पशुओं की सुध ली गयी। वर्तमान जिलाधिकारी गोपाल चंद्र डाड के द्वारा आवारा पशुओं को शहर से हटाने के लिये अब तक निर्देश जारी नहीं किये गये हैं। एकाध बार उनके द्वारा समय सीमा बैठक में अवश्य नगर पालिका को ताकीद किया गया है।

नगर पालिका के द्वारा एक निर्धारित फॉर्मेट में एक विज्ञप्ति चुनिंदा समाचार पत्रों को जारी कर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है। आगे-आगे पाठ पीछे सपाट की तर्ज पर किसी भी सीएमओ को इस तरह की विज्ञप्ति को अमली जामा पहनाने की फुर्सत नहीं मिल पाती है। हाल ही में एक बार फिर पालिका के द्वारा जारी विज्ञप्ति को अब लोग गीदड़ भभकी के रूप में ही लेते दिख रहे हैं।

नगर पालिका परिषद चाहे तो शहर से आवारा जानवर एक सप्ताह में ही बाहर कर दे, पर इसके लिये पालिका में पदस्थ अध्किारियों, कर्मचारियों और चुने हुए जनप्रतिनिधियों की कमजोर इच्छा शक्ति ही आड़े आती दिखती है। वरना क्या कारण है कि सालों से शहर में आवारा जानवर धमाचौकड़ी मचा रहे हैं और पालिका धृतराष्ट्र की भूमिका में सब कुछ देख सुन रही है।

नगर पालिका के पास हाका गैंग है। आवारा कुत्ते पकड़ने के लिये ट्रॉली है, कांजी हाऊस है। पिछले साल आवारा सूअरों के शमन के लिये महंगे विज्ञापन भी जारी किये गये थे, पर नतीजा सिफर ही निकला। आखिर इन सारी बातों को क्या माना जाये!

नवागत मुख्य नगर पालिका अधिकारी नवनीत पाण्डेय ने शुरूआती तेवर तो काफी तल्ख दिखाये पर उनके द्वारा भी नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की बजाय कार्यालय में अनावश्यक प्रोटोकाल पर ही ज्यादा ध्यान दिया गया है। सीएमओ के आरंभिक तेवरों से नगर वासियों को उम्मीद बंधी थी कि जिस नारकीय पीड़ा को वे सालों से भोग रहे हैं उससे उन्हें निजात मिल पायेगी पर ऐसा होता दिख नहीं रहा है!



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