चोर मस्त पुलिस सुस्त!

(शरद खरे)

वर्ष 2017 के अंतिम दिनों में जिला मुख्यालय में चोरों के द्वारा जिस तरह से आतंक बरपाया गया है उसे देखकर यही लग रहा है कि कोतवाली पुलिस का बस चोरों पर नहीं रह गया है। एक के बाद एक चोरी की धटनाओं के बाद भी कोतवाली पुलिस के द्वारा किसी तरह की कठोर कार्यवाही को अंजाम नहीं दिया जाना आश्चर्य का ही विषय माना जायेगा।

छिंदवाड़ा चौराहे में अग्रवाल कॉलोनी के अलावा आजाद वार्ड, भैरोगंज आदि में र्हुइं घटनाएं भी इस बात का प्रमाण हैं कि चोरों के हौसले पूरी तरह बुलंदी पर ही हैं। शहर में अन्जान चेहरे नजर आते हैं। अन्जानी महिलाएं और पुरूष गली-गली घूमकर सामान बेच रहे हैं।

जिस तरह से गैस के चूल्हे, सूट, शर्ट पेंट पीस, सलवार सूट या साड़ी आदि बेची जा रही हैं उससे अनेक प्रश्न लोगों के मानस पटल पर उठना स्वाभाविक ही हैं। अव्वल तो यह कि इनके द्वारा अमूमन एक ही बहाना बनाया जाता है कि फलां स्थान पर ट्रक खराब हो गया है, अब आखिरी लॉट ही बचा है इसलिये कम कीमत पर बेच रहे हैं।

इस तरह से अगर इनके झांसे में कोई आ जाता है तो औने-पौने दामों पर उन्हें इस तरह की सामग्री उनके द्वारा बेच दी जाती है। यक्ष प्रश्न यही खड़ा दिख रहा है कि क्या इस तरह की सामग्री को जीएसटी आदि से मुक्त रखा गया है? अगर नहीं तो इन कथित फेरीवालों से खरीदी का बिल माँगने का काम विक्रय कर विभाग क्यों नहीं करता है?

इसी तरह इन दिनों अनाथालय आदि के लिये चंदा माँगने वालों से भी लोग आज़िज आ चुके हैं। इतना ही नहीं रिक्शों पर धार्मिक चित्र लगाकर चंदा उगाहते लोगों को देखा जा सकता है। इस तरह के लोगों के द्वारा दिन में भी गली मोहल्लों के चक्कर काटे जाते हैं।

क्या इस तरह से शहर में विचरण करने वालों का कोई रिकॉर्ड कोतवाली पुलिस के पास है? जाहिर है इस सवाल का जवाब नकारात्मक ही होगा। क्या बाहर से आने वालों की मुसाफिरी दर्ज कराने का काम पुलिस के द्वारा बंद कर दिया गया है? क्या किरायेदारी के सत्यापन को बंद कर दिया गया है? क्या रिहायशी इलाकों में कार्यालय खोलने के लिये मकान किराये से लेने के लिये स्थानीय निकाय की अनुमति की दरकार नहीं होती है?

कुल मिलाकर हालात इस ओर ही इशारा करते दिख रहे हैं कि दिन भर सूने मकानों की टोह आसानी से ली जाती है चोरों के गिरोहों के द्वारा। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया एवं दैनिक हिन्द गजट के द्वारा 14 नवंबर को ही खुफिया सूत्रों के हवाले से इस खबर का प्रकाशन भी किया गया था कि बाहरी चोर गिरोहों की नजरें सिवनी पर हैं।

इस खबर के प्रकाशन के बाद से ही जिले में चोरियों की तादाद में बढ़ौत्तरी ही दर्ज की गयी है। पुलिस का अपना सूचना संकलन होता है, मुखबिर तंत्र होता है। इस तरह से अगर चोरियां हो रही हैं तो निश्चित तौर पर यह पुलिस के तंत्र पर ही सवालिया निशान खड़े कर रहा है।

दो सालों से जिले में जिस तरह का माहौल बना रहा है उससे पुलिस और आम जनता के बीच संवादहीनता भी कहीं न कहीं दिखायी पड़ने लगी है। अब लोग पुलिस को जानकारी देने से कतराने लगे हैं। इसका कारण यह है कि अगर किसी के द्वारा जानकारी दी जाती है तो उसे अनेकों सवालों से दो-चार होना पड़ता है।

संवेदनशील जिला पुलिस अधीक्षक तरूण नायक से जनापेक्षा है कि सिवनी की पुलिसिंग को एक बार फिर पटरी पर लाने की कवायद करें। वर्ष 2018 के लिये उनके द्वारा प्राथमिकताएं तय की गयी होंगी। इन प्राथमिकताओं में जिला मुख्यालय में चौक-चौराहों पर पुलिस की व्यवस्था, कोचिंग क्लासेस के आसपास इस तरह का वातावरण बनाया जाये ताकि छात्राएं भय मुक्त हों, सुबह-सवेरे छात्राओं को फब्तियां कसने वाले शोहदों पर लगाम लगाने और चोरी, सट्टा, जुआ आदि की रोकथाम के साथ ही साथ शहर की यातायात व्यवस्था को पटरी पर लाने जैसी बातें उसमें शामिल अवश्य करें, ताकि जनता को राहत मिल सके।



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