जगतगुरू शंकराचार्य थे और रहेंगे : लक्ष्मीमणि

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। शंकराचार्य बनने के लिये सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि वह गुरू परंपरा के अनुरूप हो और भगवान आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा बनाये संविधान मठाम्नाय महानुशासन मे निर्दिष्ट समस्त योग्यताओ को धारण करता हो। स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ज्यातिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद की शिष्य परंपरा मंे है, साथ ही वे मठाम्नाय महानुशासन मे निर्दिष्ट समस्त योग्यताआंे को धारण करते हैं।

उक्ताशय की बात पं.रविकांत पाण्डेय द्वारा जारी विज्ञप्ति मे हिंगलाज सेना की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री लक्ष्मीमणि ने बताया कि इसलिये शंकराचार्य बनने संबंधित समस्त योग्यताओं और संबंधित नियमावलियों को ध्यान मे रखते हुए उस समय पुरीपीठ के शंकराचार्य श्रीनिरंजनदेव तीर्थ, श्रृंगेरीपीठ के शंकराचार्य श्रीविद्यातीर्थ एवं द्वारकापीठ के अभिनव सच्चिदानंदतीर्थ शंकराचार्य ने स्वामी करपात्री महाराज के सानिध्य मे काशी विद्वत् परिषद के विद्वानों तथा भारत धर्ममंडल के प्रतिनिधियों की उपस्थिति मंे ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में जगतगुरू स्वरूपानंद सरस्वती महाराज का अभिषेक किया।

इन साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित पीठ मर्यादा महानुशासन रूपी संविधान के अनुरूप द्वारका शारदा पीठाधीश्वर धर्मसम्राट अनंत श्रीविभूषित जगतगुरू शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ही ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य हैं और आगे भी रहेंगे। उन्होंने कहा कि जो निर्णय आया है उसमे वैदिक सनातनी विधि के समस्त पहलुआंे पर ध्यान नही ंदिया गया है। उत्तम ये होता कि समस्त पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जनभावनाओं की रक्षा करते हुए निर्णय होता।

ज्ञातव्य है कि ज्योतिर्मठ के जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्रीकृष्ण बोधाश्रम महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात 07 दिसंबर 1973 को महाराजश्री का 45वें ज्योतिष पीठाधीश्वर के रूप मंे दिल्ली मंे समारोह पूर्वक काशी विद्वत्परिषद के मूर्धन्य विद्वानांे तथा अन्य तीनों पीठों के शंकराचार्यों की उपस्थिति मंे पट्टाभिषेक हुआ।

द्वारका शारदा पीठाधीश्वर अभिनव सच्चिदानंद तीर्थ महाराज एवं गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ ने महाराजश्री का ज्योतिष्पीठाधीश्वर के पद पर अभिषेक किया। श्रृंगेरी पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी विद्यातीर्थ महाराज के प्रतिनिधि द्वारा पट्ट वस्त्र भेंट किया गया। तीनों पीठों के शंकराचार्यों ने महाराजश्री के ज्ञान और पाण्डित्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

क्या है मठाम्नाय महानुशासन?

भविष्य में भी सनातन धर्म मर्यादा सुरक्षित रहे, प्रचार प्रसार होता रहे आदि शंकराचार्य भगवान ने भारत के दिगन्तांे मंे चार वेदों को आधार बनाकर चार आम्नायपीठांेे की स्थापना की। उत्तर बद्रिकाश्रम मंे अथर्ववेदीय ज्योतिषपीठ, दक्षिण श्रंृगेरी मंे यजुर्वेदीय श्रृंगेरीपीठ, पूर्व पुरी में ऋग्वेदीय गोवर्धन पीठ और पश्चिम द्वारका मंे सामवेदीय शारदापीठ चारांे पीठांे पर अपने चार सुयोग्य शिष्यों को पीठासीन किया और उनकी परम्परा चली जो आज भी अनवरत जारी है।

भगवान आदि गुरू शंकराचार्य के समय आज की तरह न्यास का कोई कानून नहीं था, लेकिन भगवान आदिगुरू शंकराचार्य ने पीठों के कार्य संचालन हेतु एवं पीठों के कार्य संचालन को अनुशासित करने हुतु व्यवस्था बनायी और नियमों को मठाम्नाय महानुशासनम नामक पुस्तक में लिखा वस्तुतः आज के न्यास कानून के अनुसार उक्त पुस्तकें भगवान आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा लिखित न्यासपत्र के समान ही हैं।

मठाम्नाय महानुशासनम पुस्तक में लिखे गये नियमों का पालन करना भगवान आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गयी पीठों की परम्परा है। पीठ के आचार्य की क्या योग्यता होनी चाहिये? इस संदर्भ मंे उक्त पुस्तक महानुशासनम मंे लिखा गया है कि जो पवित्र, जितेन्द्रिय, वेद, तथा उसके छः अंगों अर्थात शिक्षा, कल्प, निरूक्त, व्याकरण, छंद और ज्योतिष आदि मे पारंगत हो और सभी शास्त्रों अर्थात इतिहास, पुराण तथा शास्त्रीय आख्यानों मंे समन्वय की दृष्टि रखने वाला हो, वह पीठ का अधिकारी हो। उक्त सभी लक्षणंो के आधार पर ही आज महाराजश्री द्विपीठाधीश्वर के रूप मंे विराजमान हैं और रहेंगे।

महानुशासन पुस्तक मंे अयोग्य के पीठासीन हो जाने पर क्या करना चाहिये? की भी व्यवस्था है। यदि उपरोक्त बताये गये लक्षणों से युक्त व्यक्ति हो तभी वह पीठ का अधिकारी हो सकता है, अन्यथा पीठारूढ़ हो जाने पर भी मनीषियों के द्वारा पीठ से हटा दिया जाना चाहिये। इस कथन से यह तात्पर्य स्पष्टतः परिलक्षित होता है कि भगवान आदि शंकराचार्य पीठों पर योग्य व्यक्ति को ही पीठासीन होते देखना चाहते थे।



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