जबी खिचड़ी हो तैयार तो आ जाते है चार यार

(अवधेश व्यास)

खिचड़ी, बोले तो एकदम अपुन के मुलुक का लोक का माफिक। दाल का दांव अलग, चावल का चाल अलग। पन जबी मिलते है, एक साथ उबलते है, तो बात बनती है बावा जताने कू वफा, कोई बताता है नफा और जिसपे बरसी उनकी जफा, वो तो होएंगा ईच खफा, तो वो गिनाता है नुकसान हर दफा। किसका क्या गया, किसकू क्या मिला, किसने बजाई ताली और किसकू है गिला- नोटबंदी का बाद बोम्बाबोम का यईच है सिलसिला। गए बरस वो नवंबर की तारीख थी आठ, जबी मुह पे पड़ी थी चमाट और दूसरा ईच रोज लग गएली थी वाट, बोले तो जिनगी हो गएली थी सपाट।

वो रोज अपुन के मोटा भाई आए थे हर न्यूज चौनल पे और फिर पब्लिक आ गएली थी लेवल पे, बोले तो लाइन पे। गायब हुआ हजार, तो लूट गए बजार, ब्लैक मनी कू पड़ने कू थी मार, पन पैदल पब्लिक का चौन-औ-सुकूं हुआ गिरफ्तार। फिर जीएसटी आया, तो उड़ गई बची खुची बहार और उजड़ गए कारोबार। उदर कोई बोल रएला है, बोले तो नोटबंदी का बाद इनकम टैक्स भरने वाले लोक बड़ गएले और बैंक का इंटरेस्ट बी कमती हो गएला। इसपे अपुन का सलीम पानी बोलता है, भिड़ू, बैंक का इंटरेस्ट नई, बैंक में पब्लिक का इंटरेस्ट कमती हो गएला है। और इनकम टैक्स की बात क्या करने का! अपुन के इदर तो लोक जिनगी जीने का ईच टैक्स भर रएले है। जिसका पास फोन नई है, एटीएम कार्ड नई है, जो आज नगद, कल उधार की धार पे चलता है, गवरमेंट कू क्या मालूम, उसका पेट कैसे पलता है!

पानी फुल फ्लो में बहने कू लगा है। वो बोलने कू लगा, भिड़ू, जिसकू ये नई मालूम, बोले तो क्या गोल्ड, क्या पीतल, उसकू तुम क्या बनाएंगा डिजिटल! तेरेकू मालूम, कोई कोई कू एक हजार रुपया का पेंशन लेने कू जाने का वास्ते आठ सौ रुपया भाड़ा देने कू होता है, तो कोई कू एक सौ दस रुपए का राशन लेने का वास्ते एक सौ दस किलोमीटर पैदल चलके जाने कू पड़ता है। इन लोक दर रोज जिनगी का टैक्स भर रएले है। इन लोक कू बुलेट ट्रेन से क्या मिलेंगा! इन लोक कू कबी कुच मिलेंगा बी?

अपुन एक बात बोलता है भाय, बोले तो बाय गॉड की शपथ, अपुन कू खिचड़ी बोत मस्त लगता है बाप। क्या है ना खिचड़ी, बोले तो एकदम अपुन का माफिक, अपुन के मुलुक का लोक का माफिक। दाल का दांव अलग, चावल का चाल अलग, पन जबी मिलते है, एक साथ उबलते है, साथ साथ पकते है, तो एक दूसरे कू मालूम नई पड़ता, बोले तो कौन किदर है। एक दूसरा का साथ मिल के, एक दूसरा का साथ खिल के वो बात बनती है बावा, बोले तो देखने वाले पूछने कू लगते है, बोले तो क्या खिचड़ी पक रएली है! फिर जबी खिचड़ी हो तैयार, तो आ जाते है उसके चार यार, बोले तो घी, दही, पापड़, अचार। ये बोले तो अपुन की गल्ली का चाली का माफिक, किसका घर में घुसेंगा और किसका घर मे निकलेंगा, मालूम नई पड़ता।

पन अबी क्या हो रएला है भाय, बोले तो दिखाने कू बना रएले है खिचड़ी का वर्ल्ड रेकॉर्ड, पन हकीकत में उसकू कर रएले है डिसकार्ड, कायकू बोले तो अंगार पे अबी बिरयानी दम पे है। बिरयानी क्लास, खिचड़ी खल्लास। खिचड़ी इक्वलिटी, बिरयानी क्वालिटी। खिचड़ी में सब चलता है जास्ती कमती, पन बिरयानी का वास्ते मांगता है राइस बासमती, बोले तो लंबा बड़ा दाना, खुशबू वाला।

बिरयानी में कुच घुलता मिलता नई है। उदर थर है, बोले तो लेयर- पएला गोश्त, फिर बासमती का ग्लेयर। हर चीज अलग दिखती है, अलग बोलती है और एक नवी दुनिया खोलती है। अपुन बावा टपोरी टाइप का है, अपुन कू जास्ती नई समजने कू होता, पन अपुन कू लगता है, बोले तो ये नोटबंदी, जीएसटी और जीडीपी सब आदमी का वास्ते है, बोले तो आदमी इनसे ऊप्पर है, तो सोचना मांगता है, बोले तो जो दिन का उजाला में रात का माफिक जिया है, जो दर रोज दर्द का घूंट और खून का आंसू पिया है, उसका वास्ते अपुन क्या किया है।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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