जहरीला धुंआ उगलते वाहन!

(शरद खरे)

शहर में दोपहिया नहीं बल्कि अब चार पहिया वाहन भी जहरीला धुंआ उगलने लगे हैं। बताया जा रहा है कि इन वाहनों में डीजल के साथ ही साथ मिश्रित केरोसिन भी मिला होना, धुंआ फैलने का एक बड़ा कारण है। इससे जहरीले धुंए को उगलने से वातावरण भी प्रदूषित होने लगा है।

वाहनों से निकलते जहरीले दमघोंटू जहरीले धुंए की रोकथाम के लिये प्रदूषण नियंत्रण मण्डल, परिवहन और यातायात पुलिस भी संजीदा नजर नहीं आता है। इस वजह से आहिस्ता-आहिस्ता स्वच्छ पर्यावरण का माहौल भी प्रदूषित होने लगा है। जहरीले धुंए का प्रभाव अब लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता दिख रहा है।

शहर में सड़कों पर उड़ने वाली धूल और वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुंए के कारण लोग बीमार पड़ रहे हैं। लोगों की श्वास और नेत्र संबंधी बीमारियों की तादाद में इजाफा हुआ है। इक्कीसवीं सदी में वाहनों की तादाद में विस्फोटक बढ़ौत्तरी भी दर्ज की गयी है। आज चौक-चौराहों पर दो और चार पहिया वाहनों की रेलमपेल देखी जा सकती है।

पुराने यात्री वाहनों को अन्य जिलों या प्रदेशों से खरीदकर सिवनी में उन्हें नया बनाकर सड़कों पर दौड़ाने का चलन नया नहीं है। यात्री वाहनों में अधिकांश वाहन डेढ़ दो दशक से पुराने ही नजर आते हैं। पुराने वाहनों के द्वारा फिजा में कार्बन मोनो ऑक्साईड फैलाने वाले इन लापरवाह वाहनों की धरपकड़ की दिशा में भी संबंधित विभाग संजीदा नजर नहीं आते हैं।

परिवहन विभाग और यातायात पुलिस के अधिकारी भी दो या चार पहिया वाहनों के साथ ही साथ भारी वाहनों की फिटनेस, बीमा, चालक की अनुज्ञा आदि देखकर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं। किसी का भी ध्यान वाहनों के पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल (पीयूसी) की ओर नहीं है।

विडम्बना ही कही जायेगी कि जिले में कई सालों से प्रदूषण फैलाते इन वाहनों के खिलाफ किसी तरह की मुहिम भी नहीं चलायी गयी है। डीजल से चलने वाले वाहनों में केरोसिन का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है पर दीगर गैर जरूरी कामों में उलझे अधिकारियों के पास इन वाहनों की जाँच करने की फुर्सत नहीं है।

इतना ही नहीं मूल वाहन में कांट-छांट कर उसे मॉडीफाईड कर नया आकार (लुक) दिया जाकर इन्हें सड़कों पर दौड़ाया जा रहा है। इसके अलावा वाहन के मूल साईलेंसर में भी रद्दोबदल कर कानफोड़ू आवाज निकालने वाले साईलेंसर्स का चलन जमकर दिख रहा है। यह ध्वनि प्रदूषण की श्रेणी में ही आता है।

जिले में प्रदूषण का स्तर क्या है, इस बारे में शायद ही कोई जानता हो! जबकि प्रदेश के कमोबेश हर जिले में प्रदूषण का स्तर मापने की माकूल व्यवस्थाएं हैं। मीडिया में इस तरह के वाहनों के सचित्र समाचारों के प्रसारण और प्रकाशन के बाद भी जिला प्रशासन के द्वारा किसी तरह की कार्यवाही न किये जाने से यही लगता है कि जिला प्रशासन में बैठे अधिकारी शायद ही कभी स्वसंज्ञान से इस मामले में कार्यवाही को अंजाम देंगे। कुल मिलाकर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है और सरकारी नुमाईंदों के साथ ही साथ चुने हुए प्रतिनिधि भी नीरो के मानिंद चैन की बंसी बजाते ही दिख रहे हैं।



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