ढाई दर्जन ग्रामों में गठित हुईं पारंपरिक ग्राम सभाएं!

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आदिवासियों को जमकर भरमाया जा रहा पाँचवी अनुसूचि के नाम पर!

(अय्यूब कुरैशी)

सिवनी (साई)। पाँचवी अनुसूचि की व्याख्या को अपने हिसाब से किया जाकर आदिवासियों को भरमाने का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है। इसके तहत बरघाट, घंसौर, धनौरा और कुरई में पारंपरिक सभाओं का गठन भी कर लिया गया है। यहाँ सभाओं का गठन किया जाकर लगभग ढाई दर्जन ग्राम प्रधान भी बना दिये गये हैं।

जिला कलेक्टर कार्यालय के उच्च पदस्थ सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि कुछ शरारती तत्वों के द्वारा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आदिवासियों को पाँचवी अनुसूचि के नाम पर बरगलाने का काम जोर-शोर से किया जा रहा है। सोशल मीडिया व्हाट्सएप का सहारा भी कुछ तत्वों के द्वारा लिया जा रहा है।

सूत्रों की मानें तो इसके तहत बरघाट के टेटमा, बोरीकला, कोतमी, विजयपानी कला, चिमनाखारी, घंसौर विकास खण्ड के काछी बुधवारा, जम्होड़ी खुर्द, रूपदौन, खैरीकला, कुरई के रिड्डी, दलाल (कन्हाई रैयत), आतरवानी, केसरदिया आदि में पारंपरिक ग्राम सभा का गठन किया जा चुका है।

इसके साथ ही सूत्रों ने आगे बताया कि साथ ही साथ आदिवासी बाहुल्य धनौरा विकास खण्ड में मोहगाँव (चिड़ी), कुड्डो, कुंआखेड़ा, बड़ी थांवरी, तिघरा (पोस्ट सुनवारा) दोदावानी, आमानाला, बरेली, नोनिया, कुड़ारी, पिपरिया भसूड़ा, अमोली, जटलापुर, मुंगवानी आदि ग्रामों में भी पारंपरिक ग्राम सभाओं का गठन किया जाकर वहाँ ग्राम प्रधान की नियुक्ति कर दी गयी है।

सूत्रों ने बताया कि पाँचवी अनुसूचि में उल्लेखित बातों की व्याख्या अपने हिसाब से करके कुछ शरारती तत्वों के द्वारा आदिवासियों को जमकर भरमाया जा रहा है। इसके चलते आदिवासियों के बीच अब खदबदाहट बढ़ती दिख रही है। इसके पहले भी सोशल मीडिया व्हाट्सएप पर कुछ तत्वों के द्वारा आदिवासियों के हितों को साधने का स्वांग रचकर उन्हें भरमाने का प्रयास किया गया है।

इसी तरह सूत्रों ने आगे बताया कि पाँचवी अनुसूचि के नाम पर आदिवासियों को बांटने के नाम पर षणयंत्र का ताना-बाना बुना जा रहा है। आदिवासियों को यहाँ तक कहा जा रहा है कि संसद और विधानसभा में पारित नियम कायदे भी पाँचवी अनुसूचि में शामिल क्षेत्रों में लागू नहीं होंगे।

सूत्रों ने बताया कि यह सिलसिला लगभग एक साल से सतत जारी है। कुछ माह पूर्व घंसौर क्षेत्र में आदिवासियों को एक झण्डे के नीचे लाने का प्रयास भी किया गया था। इसके बाद इसी तरह का प्रयास बरघाट में भी करने की कवायद की गयी थी, किन्तु प्रशासनिक सक्रियता के चलते इन तत्वों की यह कवायद परवान नहीं चढ़ पायी थी।

(क्रमशः जारी)



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