दीपपर्व 19 को : ऐसे करें दीपावली पर पूजन की तैयारी

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। दीपावली को सिर्फ एक त्यौहार कहना गलत होगा। दीपावली तो पाँच पर्वों का अनूठा संगम है। इसमें पहला दिन धनतेरस, दूसरा नरक चतुर्दशी, तीसरा और मह्त्वपूर्ण दीपावली, चौथा दिन गोवर्धन पूजा और पाँचवां व अंतिम दिन भाई-दूज हैं। इस उपलक्ष्य में घर के बड़े-बुजुर्ग घरों की साफ-सफाई करते हैं, घरों में सफेदी कराते हैं।

दीप पर्व पर लोग घरों को सजाते हैं, नये साल का कैलेण्डर लगाते हैं। बच्चे घरों को सजाने में रुचि लेते हैं, साथ ही दीपावली के दिन से पहले ही पटाखे फोड़ना शुरू कर देते हैं। लोग आपस में मिठाईयां बाँटते हैं। बाजार नये-नये सामानों से सज जाते हैं। बाजारों में रौनक तो देखते ही बनती है।

लोग इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं। दीपावली की रात्रि को महानिशीथ के नाम से जाना जाता है। इस रात्रि में कई प्रकार के तंत्र-मंत्र से महालक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर पूरे साल के लिये सुख-समृद्धि और धन लाभ की कामना की जाती है।

दीपावली पर पूजन के लिये सामग्री : महालक्ष्मी पूजन में केसर, रोली, चांवल, पान का पत्ता, सुपारी, फल, फूल, दूध, खीर, बतासे, सिन्दूर, सूखे मेवे, मिठाई, दही गंगाजल धूप, अगरबत्ती दीपक रुई, कलावा, नारियल और कलश के लिये एक ताम्बे का पात्र होना चाहिये।

कैसे करें दीपावली पर पूजन की तैयारी

एक थाल में या भूमि को शुद्ध करके नवग्रह बनायें या नवग्रह का यंत्र स्थापित करें। इसके साथ ही एक ताम्बे का कलश बनायें, जिसमें गंगाजल, दूध, दही, शहद, सुपारी, सिक्के और लौंग आदि डालकर उसे लाल कपड़े से ढंक कर एक कच्चा नारियल कलावे से बाँध कर रख दें।

नवग्रह यंत्र जहाँ पर बनाया है, वहाँ पर रुपया, सोना या चाँदी का सिक्का, लक्ष्मी देवी की मूर्ति या मिट्टी के बने हुए लक्ष्मी-गणेश सरस्वती देवी या ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवी देवताओं की मूर्तियां या चित्र सजायें।

कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रूप मानकर दूध, दही और गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन का श्रृंगार करके फल-फूल आदि से सजायें। इसके ही दाहिने ओर एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलायें जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है।

दीवाली के दिन की विशेषता लक्ष्मी देवी के पूजन से संबंधित है। इस दिन हर घर, परिवार, कार्यालय में लक्ष्मी देवी के पूजन के रूप में उनका स्वागत किया जाता है। दीवाली के दिन जहाँ गृहस्थ और व्यापारी वर्ग के लोग धन की देवी लक्ष्मी से समृद्धि और धन की कामना करते हैं, वहीं साधु-संत और तांत्रिक कुछ विशेष सिद्धियां अर्जित करने के लिये रात्रिकाल में अपने तांत्रिक कर्म करते हैं।

पूजा का विधान

घर के बड़े-बुजुर्गों को या नित्य पूजा-पाठ करने वालों को महालक्ष्मी पूजन के लिये व्रत रखना चाहिये। घर के सभी सदस्यों को महालक्ष्मी पूजन के समय घर से बाहर नहीं जाना चाहिये। सदस्य स्नान करके पवित्र आसन पर बैठकर आचमन, प्राणायाम करके स्वस्ति वाचन करें। इसके बाद गणेशजी का स्मरण कर अपने दाहिने हाथ में गन्ध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, दव्य और जल आदि लेकर दीपावली महोत्सव के निमित्त गणेश, अम्बिका, महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली, कुबेर आदि देवी-देवताओं के पूजनार्थ संकल्प करें।

कुबेर पूजन करना लाभकारी होता है। कुबेर पूजन करने के लिये सबसे पहले तिजोरी अथवा धन रखने के संदूक पर स्वास्तिक का चिन्ह बनायें और कुबेर का आह्वान करें। सबसे पहले गणेश और अम्बिका का पूजन करें। फिर कलश स्थापन, षोणशमातृका पूजन और नवग्रह पूजन करके महालक्ष्मी आदि देवी-देवताओं का पूजन करें। पूजन के बाद सभी सदस्य प्रसन्न मुद्रा में घर में सजावट और आतिशबाजी का आयोजन करें।

आप हाथ में अक्षत, पुष्प, जल और धन राशि ले लें। यह सब हाथ में लेकर संकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिये कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान और समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूँ जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हो। सबसे पहले गणेश भगवान और गौरी का पूजन करिये।

हाथ में थोड़ा-सा जल ले लें और भगवान का ध्यान करते हुए पूजन सामग्री चढ़ायें। हाथ में अक्षत और पुष्प ले लें। अंत में महालक्ष्मी की आरती के साथ पूजा का समापन करें। घर पूरा धन-धान्य और सुख-समृद्धि युक्त हो जायेगा।

दीपावली का विधिवत पूजन करने के बाद घी का दीपक जलाकर महालक्ष्मी की आरती की जाती है। आरती के लिये एक थाली में रोली से स्वास्तिक बनायें। उस में कुछ अक्षत और पुष्प डालें, गाय के घी का चार मुखी दीपक जलायें और लक्ष्मी देवी की शंख, घंटी, डमरू आदि से आरती उतारें।

आरती करते समय परिवार के सभी सदस्य एक साथ होने चाहिये। परिवार के प्रत्येक सदस्य को लक्ष्मी देवी के सामने सात बार आरती घूमानी चाहिये। सात बार होने के बाद आरती की थाली को लाईन में खड़े परिवार के अगले सदस्य को दे देना चाहिये। यहीं क्रिया सभी सदस्यों को करनी चाहिये।

दीपावली पर सरस्वती पूजन करने का भी विधान है। इसके लिये लक्ष्मी पूजन करने के पश्चात सरस्वती देवी का भी पूजन करना चाहिये। दीपावली एवं धनत्रयोदशी पर महालक्ष्मी के पूजन के साथ ही साथ धनाध्यक्ष कुबेर का पूजन भी किया जाता है। कुबेर पूजन करने से घर में स्थायी संपत्ति में वृद्धि होती है और धन का अभाव दूर होता है।

बही खातों का पूजन करने के लिये पूजा की मुहूर्त अवधि में नवीन खाता पुस्तकों पर केसर युक्त चंदन से या फिर लाल कुमकुम से स्वास्तिक का चिन्ह बनाना चाहिये। इसके बाद इनके ऊपर श्री गणेशाय नमः लिखना चाहिये। इसके साथ ही एक नयी थैली लेकर उसमें हल्दी की पाँच गांठें, कमलगट्ठा, अक्षत, दुर्गा, धनिया व दक्षिणा रखकर, थैली में भी स्वास्तिक का चिन्ह लगाकर सरस्वती देवी का स्मरण करना चाहिये।

सरस्वती देवी का ध्यान करें। ध्यान करें कि जो देवी अपने कर कमलों में घटा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, चन्द्र के समान जिनकी मनोहर कांति है.. जो शुंभ आदि दैत्यों का नाश करने वाली है, वाणी जिनका स्वरूप है, जो सच्चिदानन्दमय से संपन्न हैं, उन भगवती महासरस्वती का मैं ध्यान करता हूं। ध्यान करने के बाद बही खातों का गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करना चाहिये।

नवग्रह यंत्र जहाँ पर बनाया गया है, वहाँ पर रुपया, सोना या चाँदी का सिक्का, लक्ष्मी देवी की मूर्ति या मिट्टी के बने हुए लक्ष्मी देवी – गणेश भगवान – सरस्वती देवी की मूर्तियां सजायें। कोई धातु की मूर्ति हो तो उसे साक्षात रूप मानकर दूध, दही ओर गंगाजल से स्नान कराकर अक्षत, चंदन का श्रृंगार करके फूल आदि से सजायें। इसके ही दाहिने ओर एक पंचमुखी दीपक अवश्य जलायें, जिसमें घी या तिल का तेल प्रयोग किया जाता है।



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