दो रैलियों के औचित्य पर प्रश्न चिन्ह!

(शरद खरे)

चैत्र नवरात्र के आरंभ के साथ ही निकाली गयी दो रैलियां लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी र्हुइं हैं। एक ही पर्व पर दो रैलियों के औचित्य को लेकर जमकर बहस चल रही है। बुधवार को एक पैदल रैली निकली तो दूसरी रैली चार पहिया वाहन की रही। लोगों का कहना है कि श्रेय लेने की होड़ में नववर्ष का यह कार्यक्रम दो भागों में विभक्त हो गया।

जिला प्रशासन के द्वारा बुलायी गयी बैठक में दोनों रैलियों में शामिल प्रबुद्ध और प्रभावशाली लोग शामिल थे। किन्ही कारणों से प्रशासन के द्वारा अगर दो पहिया वाहन रैली की अनुमति नहीं दी जा रही थी तो इसके लिये ज्यादा सोच विचार की आवश्यकता शायद नहीं थी।

अंततः बुधवार को मोटर साईकिल रैली नहीं ही निकली। पैदल रैली और चार पहिया वाहन रैलियों में शामिल प्रभावशाली और प्रबुद्ध लोग क्या प्रशासन की बैठक में ही एकराय होकर यह तय नहीं कर सकते थे कि पैदल और वाहन रैली को एक साथ एक समय पर ही निकाल लिया जाये? अगर ऐसा होता तो रैली की भव्यता और गरिमा निश्चित तौर पर अधिक होती।

दो रैलियों को निकालने के औचित्य पर बहस स्वाभाविक ही है। क्या सिवनी में नेत्तृत्वकर्ताओं के द्वारा किसी मामले में एक मत नहीं हुआ जा सकता है? क्या नेत्तृत्वकर्ताओं ने इस बारे में विचार किया है कि इस तरह दो-दो रैलियों से क्या संदेश गया होगा? नेत्तृत्वकर्ता भले ही अपनी अपनी पीठ थपथपाने में मशगूल हों किन्तु निश्चित तौर इसका संदेश बहुत अच्छा और सकारात्मक तो नहीं ही गया होगा।

पिछले कुछ सालों से नेत्तृत्वकर्ताओं के द्वारा आयोजनों में मनमानी किये जाने के आरोप भी लगते आये हैं। कोई प्रशासन की गुड बुक्स में आने के लिये तो किसी के द्वारा कभी अपनी सुविधा के हिसाब से आयोजनों को किया जाता रहा है। इस तरह की प्रक्रिया पर लोग अगर प्रतिक्रिया दें तो किसी को शायद ही आपत्ति होना चाहिये।

इस तरह से तो नयी परंपराओं का आगाज हो जायेगा और आने वाली युवा पीढ़ी प्राचीन वैभवशाली परंपराओं से शनैः शनैः दूर ही जाती चली जायेगी। वैसे भी प्राचीन परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त ही होती दिख रही हैं। पर्वों, मेलों ठेलों में भी अब वैसा उत्साह लोगों में नहीं दिखायी देता है।

बहरहाल, उन्माद की आग में धीरे-धीरे झुलस रहे सिवनी में अमन चैन जिस तरह पटरी पर लौटा है उसके लिये जिला कलेक्टर धनराजू एस., वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अवध किशोर पाण्डेय सहित उनके मातहत अधिकारी कर्मचारी बधाई के पात्र माने जा सकते हैं। जिस तरह के हालातों में दोनों ही अधिकारियों ने पदभार ग्रहण किया था तब इस तरह का अमन चैन और उसके इतनी जल्दी वापस लौटने की उम्मीद नहीं की जा रही थी, पर सब कुछ संभव हुआ तो दोनों ही अधिकारियों की दूरदर्शी और सकारात्मक सोच के चलते।



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