दो सांसद भी नहीं ला पाये अच्छे दिन

 

(लिमटी खरे)

परिसीमन के उपरांत यह पहला मौका है जबकि सिवनी जिले में केशरिया परचम वाले संसद सदस्यों को नीति निर्धारण का मौका मिला है। इसके पहले बालाघाट संसदीय क्षेत्र से भाजपा के के.डी.देशमुख और मण्डला से काँग्रेस के बसोरी सिंह मसराम ने सिवनी जिले का भी प्रतिनिधित्व किया है। दोनों ही सांसदों के खाते में कुछ खास उपलब्धियां नहीं आयीं, जिन्हें सिवनी में काँग्रेस और भाजपा के नेता गिनवा सकें। इसके बाद अब दो साल बीत गये हैं, पर सिवनी के दोनों सांसद बोध सिंह भगत और फग्गन सिंह कुलस्ते भी सिवनी के प्रति बहुत ज्यादा गंभीर दिख रहे हों, ऐसा भी प्रतीत नहीं हो रहा है।

इतिहास खंगालने पर यही मालूम होता है कि सिवनी संसदीय क्षेत्र के निर्माण के साथ यहां स्व.पंडित गार्गीशंकर मिश्र और सुश्री विमला वर्मा ने ही सिवनी की ओर ध्यान दिया। दोनों ही काँग्रेस के प्रतिनिधि रहे हैं। सिवनी में सबसे पहले 1962 में एसटी कोटे से नारायणराव मनीराम वाडीवा सांसद रहे। इसके उपरांत यह सीट विलोपित हो गयी और पुनः 1977 में अस्तित्व में आयी। 1977 में सिवनी लोकसभा से भारतीय लोकदल के निर्मल चंद जैन यहां से सांसद चुने गये। इसके उपरांत 1980 एवं 1984 में पंडित गार्गीशंकर मिश्र (काँग्रेस) ने यहां का प्रतिनिधित्व लोकसभा में किया। 1989 में किस्मत ने पलटी मारी और भाजपा के प्रहलाद सिंह पटेल को यहां का सांसद चुना गया।

1991 में एक बार फिर यह सीट काँग्रेस के कब्जे में आयी और काँग्रेस की आयरन लेडी मानी जाने वालीं सुश्री विमला वर्मा यहां की सांसद बनीं। जनता ने 1996 में उन्हें नकारते हुये यह सीट भाजपा की झोली में डाली और प्रहलाद सिंह पटेल यहां से दोबारा सांसद बने। 1998 में सुश्री विमला वर्मा पर लोगों ने पुनः ऐतबार जताया और वे यहां की सांसद बनीं।

इसके बाद सिवनी लोकसभा सीट को भाजपा ने काँग्रेस के हाथ से छीना तो उसके बाद काँग्रेस इसे वापस नहीं पा सकी। 1999 में सिवनी से रामनरेश त्रिपाठी सांसद बने। उनके उपरांत 2004 में श्रीमति नीता पटेरिया यहां से सांसद चुनी गयीं। इसके बाद परिसीमन के झंझावत में यह सीट फंसी। बिना किसी प्रस्ताव के इस सीट का विलोपन कर दिया गया।

2009 के चुनावों में सिवनी की पांच में से चार बची विधानसभा सीटों में से सिवनी और बरघाट को बालाघाट लोकसभा क्षेत्र में तो केवलारी और लखनादौन को मण्डला लोकसभा क्षेत्र में समाहित कर दिया गया। इस तरह केवलारी और लखनादौन का नेत्तृत्व काँग्रेस के बसोरी सिंह मसराम द्वारा तो सिवनी और बरघाट का बालाघाट के भाजपा उम्मीदवार रहे के.डी.देशमुख द्वारा किया गया।

सुश्री विमला वर्मा के सक्रिय राजनीति से किनारा करने के बाद केंद्र सरकार की ओर से सिवनी को जो भी मिला वह नीतिगत निर्णयों के तहत ही मिल पाया। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सिवनी के विकास के लिये सुश्री विमला वर्मा के उपरांत रहे सांसदों ने कोई ध्यान ही नहीं दिया है।

सिवनी के लिये नेरोगेज़ रेल लाईन सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही माना जाता है। नेरोगेज़ को ब्रॉडगेज़ में तब्दील करने के लिये न जाने कितने आंदोलन हुए पर नतीज़ा सिफर ही निकला। आज सिवनी की सीमा से लगे जिलों छिंदवाड़ा, नागपुर, बालाघाट, जबलपुर, नरसिंहपुर में ब्रॉडगेज़ की सीटी बज रही है। मण्डला और सिवनी में अब जाकर अमान परिवर्तन के काम को अंजाम दिया जा रहा है वह भी मंथर गति से।

रेल्वे के सूत्रों की मानें तो आसपास के जिलों में ब्रॉडगेेज़ का काम आरंभ हो जायेगा उसके बाद ही नैनपुर से छिंदवाड़ा के काम को गति दी जायेगी। यह सिवनी के साथ अन्याय ही माना जायेगा। देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान झाबुआ पॉवर लिमिटेड के द्वारा आदिवासी बाहुल्य घंसौर के बरेला में संस्थापित किये जाने वाले कोल आधारित पॉवर प्लांट में कोल आपूर्ति के लिये जबलपुर से घंसौर तक अमान परिवर्तन का काम हो चुका है। इसके आगे का काम कब होगा इस बारे में कोई कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं दिख रहा है।

आज सिवनी में आवागमन के साधनों का टोटा साफ दिखायी पड़ता है। छिंदवाड़ा से भोपाल, इंदौर यहां तक कि नई दिल्ली के लिये सीधी रेल सेवा वाकई अपने आप में एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि है। अगर सिवनी के संसद सदस्यों द्वारा लोकसभा के पटल पर सिवनी की नेरोगेज़ को ब्रॉडगेज़ में तब्दील करने की बात वजनदारी से रखी जाती तो आज यहां से भी बड़ी रेल लाईन गुज़र रही होती जिससे यहां व्यापार काफी हद तक समृद्ध हो चुका होता।

इसके साथ ही साथ सड़क मार्ग से सिवनी पहुंचना अपने आप में टेड़ी खीर ही साबित होता है। शेरशाह सूरी के जमाने की लगभग साढ़े चार सदी पुरानी जी.एन.रोड पर भी नेताओं की वक्र दृष्टि पड़ी और सिवनी से होकर गुजरने वाला फोरलेन मार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त होकर रह गया। यह मार्ग किसी और की नहीं वरन् भाजपा के आदर्श रहे पूर्व प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल की महत्वाकांक्षी योजना रही है।

इस सड़क के लिये न जाने कितने आंदोलनों के दौर हुए, पर नतीज़ा सिफर ही निकला। मतलब साफ है कि प्रयास तो हुए पर ये प्रयास दिशाहीन ही साबित हुए। अगर प्रयास सही दिशा में किये गये होते तो आज नतीज़ा कुछ और होता। बहरहाल, अब प्रदेश में भी भाजपा सरकार है और केंद्र में भी भाजपा की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार है। अब भाजपा के नुमाईंदों के पास सिवनी के निवासियों को फोरलेन के मामले में झूला झुलाने का कोई कारण नहीं बचता है। इस सड़क के संबंध में आये दिन सांसद यहां तक कि विधायकों के द्वारा भी बयानबाजी की जाती रही है। दो साल पहले फरवरी माह में सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश राय के द्वारा इस सड़क के लखनादौन से सिवनी तक के हिस्से की बाधाएं हटाने की बात कही गयी थी। सवा दो साल बीत जाने के बाद भी इस सड़क का निर्माण तो छोड़िये इसका रखरखाव भी तरीके से नहीं किया जा रहा है।

सिवनी में शिक्षा के क्षेत्र में भी बेहद कम सुविधाएं हैं। सिवनी में दो-दो सांसद होने के बाद भी और वह भी भाजपा के, (केंद्र और राज्य में भाजपा की पूरी मेजॉरिटी वाली सरकार है) के बाद भी सिवनी शिक्षा के क्षेत्र में कराह ही रहा है। कमोबेश यही बात स्वास्थ्य के मामले में भी लागू होती है। सीजीएचएस (सेंट्रल गर्वमेंट हेल्थ स्कीम) के तहत सिवनी में स्वास्थ्य सुविधाएं एवं अस्पताल खुलवाने की दिशा में सांसदों के द्वारा शायद ही प्रयास किये गये हों। और तो और फोरलेन में टोल टैक्स तो वसूला जा रहा है पर सांसदों के द्वारा यहां ट्रामा केयर यूनिट की बात मानो बिसार ही दी गयी है।

एक महत्वपूर्ण बात जिसकी ओर किसी ने अब तक पता नहीं क्यों ध्यान नहीं दिया है, वह है रोजगार के साधन। रोजगार के साधनों के अभाव में आज सिवनी का युवा क्रिकेट सट्टा, जुआ, शराबखोरी, चोरी आदि की ओर बढ़ता जा रहा है। आज सिवनी में न जाने कितने युवा बुक (क्रिकेट सट्टे को खिलवाने के लिये प्रयुक्त शब्द) लेकर बैठा हुआ है। आये दिन मारपीट या हत्याओं की बात भी सामने आ रही है।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि सिवनी में एक समय में डालडा फैक्ट्री, सिवनी केमिकल, सिवनी सोप, क्रिसेंट एलायंस, दूध डेयरी, नस फेक्ट्री, शराब आसवानी आदि हुआ करती थीं। एक के बाद एक कर सभी बंद हो गयीं। आज सिवनी में औद्योगिक क्षेत्र में लोगांें के शेड की जगह तो हैं पर उद्योग एक भी स्थापित नहीं हैं। वहीं, अगर बालाघाट और छिंदवाड़ा जिलों में देखा जाये तो उद्योगों की लाईन लगी हुई है। फग्गन सिंह कुलस्ते केंद्र में मंत्री हैं, उनके पास अनुभव है। जातिगत समीकरणों के आधार पर उन्हें दोबारा मंत्री बना दिया जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

बहरहाल एक साल बीत जाने के बाद भी केंद्र सरकार की ओर से सिवनी को कुछ न मिल पाना यह साबित कर रहा है कि सिवनी के प्रति यहां के प्रतिनिधि कितने जवाबदेह हैं। हो सकता है फग्गन सिंह कुलस्ते को मण्डला और बोध सिंह भगत को बालाघाट जिले की चिंता ज्यादा हो। अगर ऐसा है तो उन्हें यह नहीं भूलना चाहिये कि सिवनी के मतदाताओं ने भी उन्हें जनादेश देकर लोकसभा में भेजा है, जिसका सम्मान उन्हें करना ही चाहिये।

 



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