नेपाल में वाम गठबंधन

नेपाली राजनीतिक परिदृश्य में तीन प्रमुख वामदलों का विलय अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी राजनीतिक परिघटना के रूप में दर्ज होगा। सीपीएन-यूएमएल, सीपीएन-माओइस्ट सेंटर और बाबूराम भट्टाराई के नेतृत्व वाली सेंटर-लेफ्ट शक्ति पार्टी-नेपाल का विलय ऐतिहासिक है। फैसले से वामदलों का उत्साह लाजिमी है। उन्हें भरोसा है कि वोटों का बंटवारा रोककर अब वे एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनेंगे।

यूएमएल अध्यक्ष केपी ओली का दावा है कि गठबंधन आगामी संघीय और प्रांतीय चुनावों में दो-तिहाई बहुमत का लक्ष्य लेकर चल रहा है। ऐसे देश में, जहां बार-बार बदलते राजनीतिक समीकरण से सरकारें बुरी तरह प्रभावित होती हों, वहां किसी एक दल या गठबंधन की सरकार व्यापक देश हित में है, क्योंकि वह एक स्थाई और दूरगामी नतीजे देने में सक्षम होगी। हालांकि नेपाल जैसे तेजी से बदलते रहने वाले देश में देखने की बात होगी कि यह एकता कितनी प्रभावी होगी?

सीपीएन-यूएमएल का गठन 1991 में यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट के घटक सीपीएन (मार्क्सवादी) व सीपीएन (लेनिनवादी) के विलय के साथ आम चुनाव के ठीक पहले हुआ था और यह संसद में दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा। 1994 में पहली बार इसकी सरकार भी बनी। हालांकि 1998 में इसमें पहला विभाजन हुआ, जिसका खामियाजा उसे 1999 के चुनाव में भुगतना पड़ा और नेपाली कांग्रेस आगे बढ़ी। अभी गठबंधन के तात्कालिक निहितार्थ समझे जाने की जरूरत है।

माओइस्ट सेंटर के नेता दाहाल ने चुनावों तक सरकार से सहयोग बनाए रखने का वादा किया है। उधर नेपाली कांग्रेस ने वाम गठबंधन को जवाब देने के लिए डेमोक्रेटिक एलायंस की घोषणा कर रखी है। ऐसे में, देखा जाना चाहिए कि वर्तमान सरकार को अस्थिर करने या चुनाव में बाधा पहुंचाने का क्या नतीजा होगा? स्वाभाविक रूप से यह संविधान को मंजूरी देने की बहुप्रतीक्षित प्रक्रिया में भी बाधक होगा, जिसके लिए जनवरी 2018 की समय-सीमा तय है। नए गठबंधनों के इस दौर में कुछ सवाल तो हैं ही, पर उम्मीद की जानी चाहिए कि चुनाव समय से कराने पर सभी एकमत होंगे। (द काठमांडू पोस्ट, नेपाल से साभार)

(साई फीचर्स)



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