नोटबंदी के शहीदों के बारे में किसी को परवाह है?

(संजीव सिंह)

आज से ठीक एक साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1000 और 500 रुपये के नोटबंदी की घोषणा की थी। अब केन्द्र सरकार ने नोटबंदी को ना केवल एक ऐतिहासिक कदम बताया बल्कि दावा भी किया कि इसे अपार और चौमुखी सफलता मिली है। सड़कों पर लगे बड़े-बड़े विज्ञापन भी यही दर्शा रहे हैं कि कैसे 125 करोड़ देशवासियों ने काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम में मोदी का भरपूर साथ दिया परंतु यह सब करने के बावजूद, अभी भी कोई ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाया है कि नोटबंदी से देश को फायदा हुआ या नुक़सान।

फरवरी में संसद में दिए एक भाषण में मोदी ने कहा कि ईमानदार ताकतों को मज़बूत करने के लिये बेईमान लोगों पर कड़ी कार्यवाही करनी पड़ेगी। मोदी ने कहा कि नोटबंदी से सबसे ज़्यादा लाभ ग़रीब जनता को मिलेगा। अगर उनको वाकई यह विश्वास है कि नोटबंदी से काला धन और भ्रष्टाचार मिट जाएगा तो केन्द्र सरकार ने उन लोगों को क्यों अनदेखा किया हुआ है, जिन्होंने इस दौरान अपना रोज़गार खोया और जान गंवाई?

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के आंकड़ों के अनुसार, इस साल के पहले चार महीनों में करीब 15 लाख लोग बेरोज़गार हो गए। बैंको की असीमित कतारों मे खड़े-खड़े अपने पुराने नोट को बदलवाने के चक्कर में करीब 100 लोगों के मरने की खबरें भी सामने आईं थीं। उत्तर प्रदेश और केरल सरकार ने तो ऐसे मरने वाले लोगों के लिए मुआवज़ा भी देने का फैसला लिया था जबकि आंध्र प्रदेश सरकार ने कतार में खड़े लोगों को छाछ पिलाने का इंतज़ाम करवाया था।

अगर नोटबंदी वाकई में काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक युद्ध था तो फिर हमें उन लोगों को भी शहीद का दर्जा देना चाहिए, जिन्होंने कतार में खड़े अपनी जान गंवा दी। यह वे आम नागरिक थे जिन्हें अपनी सरकार की नीयत पर पूरा भरोसा था। इन लोगों में भी वही दृढ़ विश्वास था कि नोटबंदी से हमारी अर्थव्यवस्था पारदर्शी होगी और उसमें सुधार आएगा। इसीलिये यह भोले लेकिन बहादुर लोग अपनी जान की चिंता किए बगैर बैंको की कतार में खुशी-खुशी खड़े रहे। वह अपनी मेहनत का पैसा निकालने के लिए खड़े थे परंतु उसके लिए उन्हें सर्वाेच्च बलिदान देना पड़ा। अगर सरकार नोटबंदी की पहली सालगिरह को वाकई सफल मानती है तो उसे सबसे पहले इन शहीदों को सम्मान और श्रद्धांजलि देनी चाहिए।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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