पद्मावती, पद्मावती, पद्मावती, एक थी पद्मावती!

(जयंती रंगनाथन)

राजस्थान की सरजमीं पर कदम रखते ही कई ऐतिहासिक किरदार आपके साथ-साथ सफर करने लगते हैं। कई सालों पहले चित्तौड़गढ़ में गाइड ने जब एक तरफ इशारा करते हुए बताया कि यही वो स्थान है जहां रानी पद्मावती ने दूसरी कई औरतों के साथ जौहर लिया था, तो शरीर में झुरझुरी सी हो आई थी।

लौट कर मुंबई आई, तो पद्मावती को साथ ले कर। उन दिनों गूगल बाबा तो थे नहीं कि की बोर्ड पर उंगली फिराते ही जानकारियों का समंदर गोते खाने लगता। कुछ किताबें, कुछ मित्रों और इतिहास के अध्यापकों से मिली जानकारी के आधार पर एक खाका सा बन गया, दिमाग में। एक रूपसी, जिसका जन्म श्रीलंका के सिंहल द्वीप में हुआ था। पहली बार प्रसिद्ध कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 में लिखी अपनी कविता पद्मावत में उनका जिक्र किया था। चित्तौड के महाराज रतन सिंह उनके रूप की चर्चा सुन उनसे मिलने आए और दोनों का विवाह हुआ।

चित्तौड़गढ़ में गाइड आपको वो आईना भी दिखाते हैं, जहां से अलाउद्दीन खिलजी ने पद्मावती का अक्स निहारा था। राजपूतों की आन-बान-शान से पगी एक किंवदंती। क्या पद्मावती की यह कहानी जो सालों से चली आ रही है, वो महज एक किस्सा या किंवदंती है या वाकई चित्तौडगढ़ में हजारों साल पहले ऐसा कुछ हुआ था? अब तक इतिहास के पन्नों पर रिसर्च करने की जरूरत नहीं पड़ी थी। पर अब जब फिल्मकार संजय लीला भंसाली की फिल्म एक दिसंबर को रिलीज होते-होते रुक गई है, पद्मावती के चरित्र को ले कर सिर्फ राजस्थान में ही नहीं, देश के कई हिस्सों में लोग आक्रामक हो रहे हैं, यह माना जा रहा है कि फिल्म में इतिहास और तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा गया है, तब यह जानना लाजिमी है कि सच क्या है?

अगर हम फिल्म की बात कर रहे हैं, तो शायद सच उतना सच रह भी नहीं जाता। अगर पद्मावती फिल्म का नाम लीलावती होता, क्या तब भी इतना खून-खच्चर बहाने की नौबत आती? यह सवाल भी उठना दीगर है कि संजय लीला भंसाली ने गोलियों की रासलीला, रामलीला की तरह काल्पनिक किरदारों पर फिल्म बेस्ड क्यों नहीं किया? क्या यह जरूरी था कि रानी पद्मावती, राजा रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी के नाम से फिल्म बनाना?

संजय कहते हैं, हां। अगर वे किरदारों को सही नाम नहीं देते, तो शायद वे यह फिल्म बना ही नहीं पाते। ठीक है। पर सच तो यह भी है कि इतिहासकारों के अनुसार जिस सदी में अलाउद्दीन खिलजी हुए, पद्मावती के होने का कोई प्रमाण नजर नहीं आता। पद्मावती का जन्म खिलजी की मृत्यु के काफी बाद में हुआ। शायद पद्मावती की जिंदगी में जो खिलजी आया था, वो अलाउद्दीन था ही नहीं।

इतिहास को छोड़ दें, एक मान्यता और किंवदंती को लें, तो पद्मावती एक अहसास है राजपूत औरतों की जिजीविषा का। उनकी कहानी आज भी गौरवपूर्ण ढंग से पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती है। क्या इस किरदार को परदे पर आने का हक नहीं? एक सच यह भी है कि तमात विवादों में घिरी पद्मावती के प्रोड्यूसर भी जानते हैं कि अगर वे किसी खास समुदाय की भावनाओं से खिलवाड़ करेंगे, तो उनकी फिल्म एक दिन क्या, एक घंटे भी परदे पर नहीं चल पाएगी।

संजय लीली भंसाली लार्जर दैन लाइफ फिल्म बनाते हैं। उनकी पिछली फिल्में, गोलियों की रासलीला रामलीला और बाजीराव मस्तानी भी विवादों में घिरी थी। लेकिन दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर कमाल का बिजनेस किया। जिस तरह बाजीराव मस्तानी की कहानी सालों से भंसाली के दिमाग में घूम रही थी और एक समय ऐसा भी था जब वे सलमान खान और ऐश्वर्या राय के साथ यह फिल्म बनाना चाहते थे। उसी तरह पद्मावती भी उनके दिल के करीब थी।

राजस्थान की पृष्ठभूमि को ले कर वे काफी अर्से से फिल्म बनाना चाहते थे। भंसाली कहते तो हैं कि उन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने से पहले बाकायदा रिसर्च करवाया था। कई इतिहासकारों की मदद ली। भंसाली ऐसे फिल्मकार हैं जो अपना होमवर्क अच्छी तरह से करते हैं। इस फिल्म को शुरू से करणी सेना और कई दूसरे समुदायों का गुस्सा झेलना पड़ा। भंसाली अपनी पसंद की जगह पर शूटिंग नहीं कर पाए। काफी समय तक तो मीडिया को भी पता नहीं लग पाया कि इस फिल्म की शूटिंग कहा चल रही है। रिलीज के कगार पर आने के बाद अब इस फिल्म की मुसीबतें हर दिन बढ़ती जा रही हैं।

एक दिलचस्प बात यह भी है कि 1963 में तमिल में चित्तौड़ रानी पद्मिनी नाम से फिल्म बनी थी। इस फिल्म में रानी पद्मावती का किरदार वैजयंती माला ने और राजा रतन सिंह की भूमिका साउथ के सुपर स्टार शिवाजी गणेसन ने निभाया था। आज की पद्मावती की कहानी भी वही है। विवाद अपनी जगह है, सचाई अपनी जगह। राजपूत मर्यादा और आन-बान अपनी जगह है, सिनेमाई स्वतंत्रता अपनी जगह। फिल्म कला का एक माध्यम है और दर्शकों के पास यह चुनने का हक है कि वे क्या देखना चाहते हैं और क्या नहीं?

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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