पाकिस्तान और जम्हूरियत

लगभग 18 साल पहले जम्हूरी निजाम के खिलाफ एक और अनर्थकारी प्रयोग का शिकार बना था पाकिस्तान। तब जनरल परवेज मुशर्रफ ने संविधान की अपनी शपथ को तोड़ते हुए गैर-आईनी तरीके से मुल्क की हुकूमत हथिया ली थी। पहले की तीन फौजी हुकूमतों की तरह मुशर्रफ की सदारत का चौथा प्रयोग भी अनर्थकारी साबित हुआ।

इसने पाकिस्तान और इसके तमाम इदारों को भारी नुकसान पहुंचाया। करीब 10 साल पहले जनरल मुशर्रफ की हुकूमत के आखिरी काले दिनों ने फौजी शासन की समस्या को शिद्दत से उभारा था। कोई भी दलील इस बुनियादी सच्चाई को बदल नहीं सकती कि फौजी हुकूमत का जम्हूरी उसूलों के साथ कोई तालमेल नहीं होता, जबकि उन्हीं उसूलों की बुनियाद पर पाकिस्तान वजूद में आया।

पाकिस्तान की तकदीर तब भी जम्हूरियत से नत्थी थी, और हमेशा रहेगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी मौजूदा जम्हूरी व्यवस्था बुरी तरह कमजोर हो चुकी है। यह एक तारीखी हकीकत है कि हम लगातार तीसरे आम चुनाव से चंद महीने दूर हैं, मगर पिछले 18 महीनों से सुलग रहे सियासी संकट ने मुल्क के समूचे तंत्र को अनिश्चितता के भंवर में फंसा दिया है।

दरअसल, लोकतांत्रिक संस्थाओं में भरोसा तब कमजोर होता है, जब अवाम के नुमाइंदे अपने फायदे के लिए कानून को तोड़ते-मरोड़ते हैं। पाकिस्तानी लोकतांत्रिक व्यवस्था रद्द किए जाने के लिहाज से इसलिए भी संजीदा है कि यहां की संस्थाएं अपने आकाओं के हुक्म और हितों का ख्याल रखती हैं।

आखिरकार, जनरल मुशर्रफ हुकूमत को हथियाने में इसलिए कामयाब हुए, क्योंकि एक फैसला किया गया था कि संविधान सर्वाेच्च नहीं है और मुल्क को तबाही से बचाने के लिए कुछ इदारों की दखलंदाजी को जरूरी माना गया था। जब तक यह मानसिकता बनी रहेगी, मुल्क में जम्हूरियत को खतरा बना रहेगा। अपने संस्मरण इन द लाइन ऑफ फायर में जनरल मुशर्रफ ने माना है कि तख्तापलट के बाद उस दिन उन्हें इस बात का कोई इल्म न था कि अब किस तरह आगे बढ़ा जाए? इसमें यह सबक है कि आज कदम उठाने से पहले कल के बारे में सोचिए। (द डॉन, पाकिस्तान से साभार)

(साई फीचर्स)



0 Views

Related News

उन तमाम मसलों पर चीन और अमेरिका की राय एक-दूसरे के उलट होती है, जो अक्सर काफी चर्चा में होते.
क्षेत्रीय संसद द्वारा अपनी आजादी पर मुहर लगाने के साथ ही कैटेलोनिया जश्न में डूबा ही था कि स्पेन की.
भारत में निवेश को बढ़ावा देने वाले जरूरी नीतिगत ढांचे और दिशा-निर्देशों पर चर्चा करने के लिए अक्तूबर के आखिरी.
चार महीने के संघर्ष के बाद पिछले हफ्ते अमेरिकी फौज को रक्का में मिली जीत एक बड़ा प्रतीकात्मक महत्व रखती.
अगर डोनाल्ड ट्रंप यह सोचते हैं कि राष्ट्रपति पद का इस्तेमाल निजी हित में करने में कोई गलती नहीं है,.
बांग्लादेश में अक्षय स्रोत से बिजली उत्पादन बढ़ाने की दिशा में अत्यंत धीमी प्रगति न सिर्फ इसलिए चिंताजनक है कि.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *