पुलिस आखिर है किसकी सुरक्षा के लिये!

(लिमटी खरे)

प्रियदर्शनी जिला चिकित्सालय में मारपीट, अभद्रता की एक के बाद एक घटनाओं के बाद 27 अक्टूबर को कर्मचारी नेता टीकाराम बघेल के द्वारा जिला प्रशासन को दो दिन का अल्टीमेटम दिया गया कि अगर अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता नहीं हुई तो सोमवार यानी 30 अक्टूबर को काम बंद हड़ताल की जायेगी। सोमवार को जिला प्रशासन के द्वारा जिला चिकित्सालय में पुलिस और नगर सेना के लगभग एक दर्जन अधिकारी कर्मचारियों की तैनाती कर दी गयी। इससे एक प्रश्न लोगों के दिलो दिमाग में कौंधना स्वाभाविक ही है कि पुलिस आखिर किसी सुरक्षा के लिये है?

यह प्रश्न कौंधना इसलिये तर्कसंगत माना जा सकता है क्योंकि जिला चिकित्सालय एक सरकारी संस्था है और अस्पतालों की सुरक्षा के लिये प्रदेश शासन के द्वारा बकायदा बजट का आवंटन किया जाता है ताकि मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी एवं सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक के द्वारा स्थानीय स्तर पर निविदा को बुलवाकर अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करवायी जा सके।

जिले के अन्य सामुदायिक, प्राथमिक, उप स्वास्थ्य केंद्रों में जिस तरह सुरक्षा व्यवस्था आऊट सोर्स कर संचालित हो रही है, उसी तरह जिला चिकित्सालय में भी हो सकता था। यह अगर नहीं हो पाया तो इसके पीछे दोषी कौन है? क्या कारण रहे हैं कि अस्पताल की सुरक्षा का ठेका अब तक नहीं हो पाया है? इस बारे में भी विचार करना जरूरी है।

जिला चिकित्सालय की सुरक्षा व्यवस्था इसके पहले इंदौर मूल की कामथेन सिक्योरिटी सर्विस के द्वारा की जा रही थी। इसके लिये उसके द्वारा अस्पताल प्रबंधन से किये गये अनुबंध के आधार पर 14 सुरक्षा कर्मियों के लिये एक लाख 08 हजार 897 रूपये की राशि भी दी जाती थी। कामथेन को यह काम 31 अगस्त तक संपादित करना था। किन्तु उसका सुरक्षाकर्मी रखने का लाईसेंस ही 15 अगस्त को समाप्त हो गया था। यह बहुत बड़ी चूक थी, जिसके लिये सीधे-सीधे सिविल सर्जन ही जवाबदेह रहे हैं।

इतना ही नहीं अगर 31 अगस्त को सुरक्षा का ठेका समाप्त हो रहा था तो इसके एक माह पहले ही अस्पताल प्रबंधन को सुरक्षा के ठेके के लिये बकायदा निविदा बुलवाकर समय रहते (अगस्त माह में ही) इसे अंतिम रूप दे दिया जाना चाहिये था। विडम्बना ही कही जायेगी कि नवंबर माह आरंभ हो चुका है और अब तक सुरक्षा का ठेका किसे दिया गया है या क्या कार्यवाही की गयी है इस बारे में अस्पताल प्रबंधन के जबड़े सिले हुए ही हैं।

अस्पताल में जिस तरह की अराजकता (सुरक्षा के मामले में) है वह रातों रात तो पैदा नहीं हुई होगी। इसके पहले भी अस्पताल में (जब कामथेन की सुरक्षा व्यवस्था थी) तब अस्पताल में सुरक्षा कर्मी ही नशे की हालत में पाये जाते थे। यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि अस्पताल के रिकॉर्ड में यह बात दर्ज है।

इसके बाद अस्पताल में शराबखोरी चरम पर पहुँचने लगी। अस्पताल को लोगों के द्वारा देर रात शराब पीकर सैर के लिये बगीचा समझ लिया गया। यह सब कुछ तब होता रहा जबकि जिले के एक सांसद उस समय केंद्र में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री (फग्गन सिंह कुलस्ते) एवं प्रभारी मंत्री (आज भी) प्रदेश के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री (शरद जैन) हैं। इतना ही नहीं अस्पताल परिसर में ही मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.राजेंद्र कुमार श्रीवास्वत ने आईपीपी 06 को अपना आवास बनाया हुआ है।

यक्ष प्रश्न यही है कि क्या मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.आर.के. श्रीवास्तव ने कभी जिला चिकित्सालय की समस्याओं की ओर ध्यान देने की कोशिश की। समाचार पत्रों में लगातार ही अस्पताल में गुण्डागर्दी, शराबखोरी, मारपीट की खबरें सुर्खियां बनती रहीं, तब भी सीएमएचओ ने किसी तरह का संज्ञान नहीं लिया।

अस्पताल में एक के बाद एक घटनाओं के बाद कर्मचारी संघ के नेता टीकाराम बघेल के द्वारा प्रशासन को अल्टीमेटम दिया गया और प्रशासन के द्वारा अस्पताल में अस्थायी व्यवस्था के तहत पुलिस और नगरसेना की तैनाती की गयी। टीकाराम बघेल निश्चित तौर पर अपनी इस सफलता पर गदगद होंगे। उनके द्वारा प्रशासन को धन्यवाद देते हुए चिकित्सकों और पेरामेडिकल स्टॉफ को समन्वय बनाकर काम करने की नसीहत दी गयी।

पर शायद टीकाराम बघेल यह भूल गये कि वे स्वयं क्या कर रहे हैं? उनकी तैनाती कहाँ है? क्या वे जो तनख्वाह पा रहे हैं वह काम के एवज में पा रहे हैं? उनकी तैनाती अस्पताल के टीबी प्रभाग में एक्स-रे टेक्नीशियन के पद पर है। वे स्वयं ही इस बात को बता सकते हैं कि उनके द्वारा तैनाती के दौरान कितने एक्स-रे लिये गये? टीबी की एक्स-रे मशीन सालों से धूल ही खा रही है, फिर शासन उन्हें वेतन किस बात का दे रही है.. यह बात भी शोध का ही विषय है!

देखा जाये तो जिला प्रशासन को इस समस्या के लिये मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी तथा सिविल सर्जन को तलब किया जाना चाहिये था एवं उनसे इस बात का स्पष्टीकरण लिया जाना चाहिये था कि आखिर सीएमएचओ और सीएस के द्वारा अब तक (ठेका समाप्त हुए दो माह बीतने एवं कामथेन के लाईसेंस के समाप्त होने के ढाई माह तक) कोई कार्यवाही क्यों नहीं की गयी? यह इसलिये भी आसान है क्योंकि दोनों ही पदों पर डॉ.आर.के. श्रीवास्तव पदस्थ हैं, इसलिये एक ही व्यक्ति से सवाल जवाब किये जा सकते हैं।

इस तरह अगर अस्पताल में सुरक्षा कर्मियों के स्थान पर पुलिस की तैनाती कर दी गयी है तो आने वाले समय में अन्य स्थानों पर (जहाँ सुरक्षा कर्मी तैनात हैं) के द्वारा भी अगर पुलिस व्यवस्था की माँग की गयी तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये। यक्ष प्रश्न यही है कि क्या इन पुलिस के अधिकारी-कर्मचारियों का वेतन अस्पताल प्रबंधन के द्वारा पुलिस के खाते में जमा करवाया जायेगा! पुलिस आम जनता की हिफाजत के लिये है और अस्पताल की सुरक्षा का दायित्व प्रबंधन का है इसके लिये उसके पास पर्याप्त बजट भी है फिर भी . . .!



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