पढ़ाई कभी बेकार नहीं जाती

घटना 19वीं सदी की है। स्कॉटलैंड के एक निर्धन परिवार में एक बालक ने जन्म लिया। उसका पिता एक छोटा-सा खोमचा लेकर फेरी लगाया करता था और मां घर पर केक बनाकर सड़क के नुक्कड़ पर बेचा करती थी। होश संभालने पर बालक को असहास हो गया कि इस गरीबी के वातावरण में यहां रहकर विकास नहीं हो सकता। कुछ दिनों में अपने माहौल से वह इतना ऊब गया कि घरवालों को कुछ बताए बिना अमेरिका चला गया। वहां उसे एक इस्पात कंपनी में चपरासी का पद मिल गया।

काम ज्यादा नहीं था। जब घंटी बजती वह मैनेजिंग डायरेक्टर के सामने हाजिर हो जाता और काम पूरा करके केबिन के बाहर रखे स्टूल पर बैठ जाता। उसे बेकार समय गुजारना अच्छा नहीं लगता था। इसलिए मैनेजिंग डायरेक्टर से उसने यह इजाजत ले ली कि खाली समय में वह उनकी अलमारी से किताबें निकालकर पढ़ेगा और फिर उसे सुरक्षित अलमारी में रख देगा। अब वह खाली समय में पुस्तकें पढ़ा करता। एक दिन डायरेक्टर्स मीटिंग में डायरेक्टर्स के बीच किसी बात पर विवाद होने लगा। वे किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहे थे। वह चपरासी सभी चर्चा सुन रहा था। वह अपने स्थान से उठा और अलमारी से एक पुस्तक निकालकर उस पृष्ठ को खोलकर उनकी मेज पर रख दिया, जिसमें उस प्रश्न का उत्तर था।

तब एक स्वर से सबने उसकी विद्वत्ता को सराहा। उस चपरासी ने उद्देश्यपूर्ण और योजनाबद्ध ढंग से स्वाध्याय करके दिखा दिया कि अध्ययन के बल पर व्यक्ति बड़ी से बड़ी योग्यता हासिल कर सकता है। प्रगति के मामले में वह यहीं तक नहीं रुका रहा। परिश्रम, लगन और निरंतर स्वाध्याय से उसने अच्छा खासा धन भी अर्जित किया। इतिहास में उसे चौरिटी के लिए मशहूर अमेरिकी करोड़पति एंड्रयू कार्नेगी के रूप में जाना जाता है।

(साई फीचर्स)



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