मिलावटी दूध, विभाग मौन!

(शरद खरे)

जिला मुख्यालय में मनमानी दरों पर दूध का विक्रय हो रहा है। ग्रामीण अंचलों से दूध लेकर आने वालों के द्वारा जिस स्तर का दूध प्रदाय किया जा रहा है उसे देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इस तरह का दूध मिलावटी और पानी मिला हो सकता है।

दूध सहित खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिये शासन की ओर से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अधीन खाद्य एवं औषधि प्रशासन प्रभाग और नगर पालिका का स्वास्थ्य अमला कार्यरत है। याद पड़ता है कि दो-तीन दशकों पूर्व सड़कों पर खड़े होकर इस अमले के मातहत कर्मचारियों के द्वारा दूध के परीक्षण का काम किया जाता रहा है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहंीं है कि दो-ढाई दशकों से इस तरह से दूध की जाँच का काम बंद ही कर दिया गया है। लगता है कि कलफ चढ़े या सूटेड-बूटेड अधिकारी-कर्मचारियों के द्वारा सड़क पर उतरने में शर्म ही महसूस की जा रही है वरना क्या कारण है कि जाँच की कार्यवाही को अंजाम नहीं दिया जाता है।

इसके अलावा शहर भर में बिक रही प्रदूषित सामग्री को खाकर लोग रोज ही बीमार पड़ रहे हैं, पर विभाग पूरी तरह से निष्क्रिय ही नजर आता है। त्यौहारों के आसपास अवश्य ही विभाग के द्वारा ग्रामीण अंचलों की कुछ दुकानों पर छापामार कार्यवाही कर नमूना एकत्र कर जनसंपर्क कार्यालय के माध्यम से खबरें जारी कर अपनी पीठ थपथपायी जाती है। जिला मुख्यालय में चल रहे होटल, दूध के विक्रय केंद्र आदि में छापामार कार्यवाही से पता नहीं क्यों संबंधित विभाग के अधिकारी कतराते ही नजर आते हैं।

आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन के साथ ही साथ स्थानीय निकायों ने इस मामले में मुँह फेरा हुआ है पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सहित सांसद-विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष, चुने हुए पार्षदों ने भी इस मामले में ध्यान देना उचित नहीं समझा है।

आये दिन समाचारों में मिलावटी दूध और खाद्य सामग्रियों के सेवन से मनुष्य को होने वाले नुकसान के बारे में जानकारियां दी जा रही हैं, इसके बाद भी संबंधित विभागों की कुंभकर्णीय निद्रा नहीं टूट सकी है। लोग बीमार पड़ते हैं तो पड़ते रहें पर जनता के गाढ़े पसीने से संचित राजस्व से वेतन पाने वाले सरकारी नुमाईंदों को इससे ज्यादा लेना-देना प्रतीत नहीं हो रहा है।

सांसद-विधायक सहित चुने हुए प्रतिनिधियों से अब उम्मीद करना बेमानी ही प्रतीत हो रहा है। खाद्य विभाग का अमला भी पूरी तरह हाथ पर हाथ रखे ही बैठा है। संवेदनशील जिला कलेक्टर गोपाल चंद्र डाड से जनापेक्षा है कि जनता के स्वास्थ्य से सीधे जुड़े इस मामले में वे ही संज्ञान लेकर संबंधित विभागों को पाबंद करें ताकि जनता के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने से रोका जा सके।



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