मुस्लिम समाज का नेतृत्व संकट

(सलमान खुर्शीद)

पिछले पांच वर्षों में देश में धीरे-धीरे जिस तरह से सांप्रदायिक ताकतों का उभार बढ़ा है, उससे देश के मूलभूत सिद्धांतों को तो चुनौती मिली ही है, मुसलमान खासतौर से एक अनिश्चय भरा मौन साधने को मजबूर हुए हैं। सांप्रदायिक दंगे और दैनिक जीवन में व्यक्तिगत द्वेष की छिट-पुट घटनाएं पहले भी हुआ करती थीं।

ऐसी शिकायतें भी थीं कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकारें इनसे निपटने और जान-माल संबंधी नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाती हैं। मगर बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई और देश के उत्तरी हिस्सों में जैसी सांप्रदायिक हिंसा दिखी, वह बंटवारे के दौरान हुए दंगों के बाद की सबसे बदतर तस्वीर थी। निश्चित तौर पर वह एक ऐसी प्रतिक्रिया का नतीजा थी, जिसकी निंदा की जानी चाहिए। उन दंगों ने दहशतगर्दी की दुनिया में एक नया आयाम जोड़ते हुए संपूर्ण मुंबई को झकझोरकर रख दिया था।

हमें समझना होगा कि मुंबई हमलों या बाटला हाउस एनकाउंटर में जो आतंकी कारस्तानी दिखी थी, वह पूर्ववर्ती कारणों की परिणति नहीं थी। दुखद है कि जब इसके पक्ष में बात होती है, तो विरोध-प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं और दहशतगर्दों से सहानुभूति रखने के आरोप जड़ दिए जाते हैं। मार-काट या आतंकवाद से कोई भी इंसान मूल रूप से नफरत ही करता है। फिर भी अगर कोई इसकी तरफ बढ़ता है, तो न्याय की विफलता भी एक वजह हो सकती है।

मगर दहशत व विनाश की पटकथा बनने वाले इस गुस्से को जब-जब समझने का प्रयास किया जाता है, इसे देशद्रोही कृत्य के रूप में प्रचारित किया जाता है। ऐसे में, कैसे मान लिया जाए कि हम कभी समझ भी पाएंगे कि क्या गलत हो रहा है? और ऐसी स्थिति में हम उस बड़े खतरे को भला कैसे खत्म कर पाएंगे, जो केवल और केवल विनाश को न्योता देता है?

यह सचमुच दुखद है कि दुनिया के कई हिस्सों में इस्लाम का जुड़ाव हिंसक घटनाओं में दिखा है। मगर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि पीएलओ के हथियार उठाने और लैला खालिद के रिश्ते भी इस्लाम से ही हैं, लेकिन संभवतः यहूदियों के अलावा दुनिया में कहीं भी उन्हें नफरत की निगाह से नहीं देखा जाता। इतना ही नहीं, दुनिया का कोई भी मुसलमान शायद ही ओसामा बिन लादेन या आईएसआईएस के कृत्यों को माफ कर पाए? इससे इनकार नहीं है कि कुछ सिरफिरे लोग या हत्यारे हैं, जो इस्लाम के नाम पर कुकृत्य करते हैं, लेकिन इससे यह महजब तो वैसा नहीं बन जाता, जैसा कि कुछ लोग स्थापित करने की कोशिश करते हैं। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए इसकी गलत व्याख्या करना या इसके उसूलों का बेजा इस्तेमाल करके दुनिया के एक महान व समतावादी धर्म का कृत्रिम दुश्मन बनना उचित नहीं। अस्तित्व व समृद्धि के लिए हमें सह-अस्तित्व की जरूरत है, किसी टकराव की नहीं। निजी एजेंडे के लिए इस्लाम को खलनायक बताने वाले लोग दरअसल उन्हीं लोगों की तरह हैं, जो इसका अपने हित में घटिया और निकृष्ट इस्तेमाल करते हैं।

एक दौर था, जब वैश्विक मंचों पर भारत खुलकर अपनी राय जाहिर करता था। इसकी वजह यह नहीं थी कि दुनिया में मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हमारे यहां बसती है, बल्कि कारण कई अन्य थे। भारत की राय को पर्याप्त तवज्जो दी जाती थी। मगर जब देश के भीतर ही मुसलमानों के साथ ईमानदार व सीधा संवाद नहीं होगा, तो भला अब हम कैसे वैश्विक मसलों पर मुखर हो सकते हैं? यदि मुल्क में मुसलमानों के स्वर दबाए जाएंगे, तो क्या हम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक विश्वसनीय आवाज बन सकेंगे? इसीलिए फलस्तीन, ईरान, इराक, अफगानिस्तान, गल्फ कोऑपरेशन कौंसिल, सीरिया, इस्लामी सहयोग संगठन आदि अब किन्हीं घटनाओं पर प्रतिक्रिया जाहिर करने के लिए भारत के रुख का इंतजार नहीं करते। रूस अब हमसे कोई विचार-विमर्श नहीं करता, और अमेरिका भी आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक जंग में सिर्फ हमारा सहयोग चाहता है, लेकिन हमारे यहां की आतंकी वारदात की सूरत में वह कोई मदद नहीं करना चाहता।

सच यह है कि भारतीय मुसलमानों ने बंटवारे के वक्त पाकिस्तान की बजाय भारत को चुना था। उन्होंने जिन्ना व लियाकत अली की बजाय गांधीजी और पंडित नेहरू पर भरोसा किया। मुल्क के लिए बलिदान दिया। बिग्रेडियर उस्मान, हवलदार अब्दुल हमीद से लेकर लेफ्टिनेंट हनीफुद्दीन तक ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जिन्होंने इस मुल्क को गढ़ने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। मगर आज भारतीय मुसलमान नेतृत्वहीन और स्वरविहीन है। उसने अपने लिए एक नई सीमा-रेखा खींच ली है, और वह उसी कैद में जीने लगा है। जो राजनीतिक दल दशकों से मुसलमानों की मदद से अपनी सियासी जमा-पूंजी हासिल करते रहे हैं, वे भी अब सावधान होकर रणनीतिक रुख अपनाने लगे हैं। भारत की नींव रखने वालों ने बुनियादी उसूलों को एक थाती हमें सौंपी है। उसमें तमाम विरोधी ताकतों से टकराने और जीतने की क्षमता है। यह दशकों से साबित भी होता रहा है। मगर जब हम अपनी इस क्षमता पर ही भरोसा खो देंगे, तो जाहिर तौर पर विरोधी ताकतें जीत जाएंगी।

मुश्किल यह है कि मुसलमान जिस दुविधा का सामना कर रहे हैं, वह उनकी नुमाइंदगी करने वाले नेताओं को लेकर कहीं ज्यादा है। इसकी वजह यह है कि पारंपरिक रूप से उन्हें मुसलमानों का नेता माना जाता है, बजाय इसके कि ऐसे नेता, जो मुसलमान हैं। दलित व ओबीसी नेताओं के उलट मुस्लिम नेताओं की छवि पहले खंडित की जाती है और फिर उन्हें सांप्रदायिक ठहरा दिया जाता है। इस दौरान, उनके अपने समुदाय के लोग भी प्रतिनिधित्व की उनकी मंशा पर सवाल उठाते हैं। 2017 का गुजरात चुनाव इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसमें दिखा कि किस तरह न्याय के लिए जाति और समानता के लिए बहुसंख्यक धर्म के इस्तेमाल को तो मुनासिब समझा गया, लेकिन अल्पसंख्यकों के लिए निष्पक्षता को तवज्जो नहीं मिली।

भारत निश्चित तौर पर हमेशा पाकिस्तान से अधिक मजबूत रहेगा, लेकिन क्या आने वाले दिनों में हम राजनीति में भी उससे कहीं अधिक बौद्धिकता व श्रेष्ठता का दावा करते रह पाएंगे? अतीत में गैर-राष्ट्रवादियों ने हमारी महान एकता को कमजोर किया था; मौजूदा भारत का कथित राष्ट्रवाद एक नया खतरा बनकर उभरा है। सवाल यह है कि क्या इसे सफल होने देना चाहिए?

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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