मोदीजी आपको महाभारत की भी समझ नहीं

(अमीश राय)

खुला खत लिखने का जमाना है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी इसे भी खुला खत ही समझें। मोदीजी आप तो जानते ही हैं कि आपको संबोधित करते हुए मैं ज्यादा बातें नहीं बनाता। सीधे मुद्दे पर आता हूं। प्ब्ैप् के गोल्डन जुबली समारोह पर आपका पूरा संबोधन सुना। मोदीजी आपने भयंकर निराश किया। देश के घरेलू माहौल पर आपके भाषण या दूसरे देशों के साथ संबंधों पर आपके कूटनीतिक व्यक्तव्यों ने कमोबेश मुझे हमेशा निराश किया पर प्ब्ैप् वाले को सुनकर तो कुछ ज्यादा ही दुख हुआ। मोदीजी आपको तो महाभारत की भी समझ नहीं है। व्यास द्वारा रचित वही महाभारत जिसे जब धारावाहिक बनाकर बीआर चोपड़ा ने दूरदर्शन पर दिखाया तो टीवी के जमाने में क्रांति आ गई। शानदार लेखक राही मासूम रजा ने ऐसी स्क्रिप्ट लिखी कि तातश्री और पितामह के माध्यम से महाभारत बच्चे-बच्चे को रट गई।

मोदीजी, आप तो कथित हिंदूवादी राजनीति करने वाली पार्टी के सबसे शानदार खिलाड़ी माने जाते हैं। मुझे आश्चर्य है कि आपने कैसे महाभारत तक को नहीं समझा? आपने अपने संबोधन में देश की गिरती इकॉनमी के बचाव के लिए विरोधियों को निगेटिव खबर फैलाने का दोषी बताते हुए बार-बार शल्य प्रवृत्ति से पीड़ित बताया। मुझे तो लगता है कि विरोधियों से ज्यादा आपके निशाने पर आपके ही पार्टी के बुजुर्ग यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी थे। ऐसा लगने के पीछे मेरे पास वाजिब कारण हैं। आगे आपको वह भी बताऊंगा, लेकिन बात पहले महाभारत को लेकर आपकी नासमझी पर हो जाए।

मोदीजी आप जानते भी हैं कि शल्य प्रवृत्ति क्या होती है?

मोदीजी आपने शल्य प्रवृत्ति को अपने संबोधन का हथियार तो बनाया पर मुझे शक है कि आपको इसके बारे में जानकारी भी है या नहीं। तो चलिए आपको पहले महाभारत की कहानी ही सुना देता हूं। बेसिक तो आप जानते ही होंगे कि महाभारत की लड़ाई पांडवों और कौरवों के बीच लड़ी गई थी। पांडव राजा पांडु के पुत्र थे तो कौरव धृतराष्ट्र के। पांडु की दो पत्नियां थीं। एक कुंती और दूसरी माद्री। माद्री (नकुल, सहदेव की मां) के भाई का नाम शल्य था और वह मद्र देश के राजा थे। यानी शल्य रिश्ते में पांडवों के सगे मामा लगते थे। शल्य अपने जमाने के शानदार सारथी और योद्धा थे।

अब जब महाभारत के युद्ध का समय आया तो शल्य अपनी सेना के साथ पांडवों की तरफ से लड़ने के लिए चले। पर दुर्याेधन ने बीच रास्ते में ही शल्य के स्वागत की व्यवस्था करा दी। शल्य को लगा कि यह व्यवस्था पांडवों की तरफ से हुई है। उन्होंने और उनकी सेना ने आतिथ्य सत्कार का पूरा आनंद उठाया। जब रवानगी की बारी आई तो पता चला कि इसके पीछे तो दुर्याेधन था। दुर्याेधन ने इस आतिथ्य सत्कार के एवज में शल्य से महाभारत के युद्ध में साथ मांगा। शल्य को मजबूरन दुर्याेधन का साथ देना पड़ा। पर युद्ध से पहले पांडव जब शल्य से मिलने आए तो कौरवों की तरफ से लड़ते हुए भी शल्य ने युधिष्ठिर को जीत का आशीर्वाद दिया।

शल्य को जानने के बाद अब आते हैं शल्य प्रवृत्ति पर। मोदीजी आपने अपने संबोधन में लोगों को बताया कि शल्य युद्ध के दौरान कौरवों और कर्ण को हतोत्साहित करते रहते थे। आपने बिल्कुल सही बताया, लेकिन हतोत्साहित क्यों करते थे, आप इसे नहीं बता पाए। महाभारत की कहानी के संदेश के मुताबिक कौरव पक्ष अन्याय के साथ खड़ा था और पांडव पक्ष न्याय और धर्म के साथ खड़ा था। अन्याय पर न्याय की विजय और धर्म के हाथों अधर्म की पराजय के लिए जरूरी था कि शल्य सत्य का साथ देते। शल्य ने हतोत्साहित नहीं किया था। शल्य ने कर्ण समेत कौरवों को हकीकत बताई थी कि तुम पांडवों को हरा नहीं सकते।

मोदीजी जब अपने ही घर का कोई बुजुर्ग सदस्य सलाह दे रहा हो तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए। पर आप और आपकी पार्टी इसे नहीं समझ सकती क्योंकि आपके यहां बुजुर्गों को निर्णायक मंडल बनाकर किनारे करने की परंपरा है। आडवाणी, यशवंत सिन्हा और शौरी, सब इसकी मिसाल हैं। शल्य ने बेसिकली धर्म का साथ दिया था। शल्य को पता था कि सच क्या है, उन्होंने कर्ण को, कौरवों को उनकी कमियां बताईं। उन्होंने कौरवों को समझाया कि कुछ भी कर लो युद्ध पांडव ही जीतेंगे।

पर कर्ण और कौरवों ने उन कमियों पर ध्यान देने की बजाय शल्य की हंसी उड़ाई। ठीक वैसे ही जैसे आज जब आपके पार्टी के वेटरन तक आपको बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था संकट में है, रोजगार का सृजन नहीं हो रहा, तो आप उनकी हंसी उड़ा रहे हैं। बेशक आप हंसी उड़ाइए, यह आपका हक है, लेकिन महाभारत के शल्य को तो इसके लिए बदनाम मत कीजिए। महाभारत के युद्ध का अंत क्या हुआ, सबको पता है। महान योद्धा कर्ण मारा गया। शल्य को पांडवों के खिलाफ कौरवों का सेनापति भी बनना पड़ा। शल्य भी युद्धिष्ठिर के हाथों मारे गए। महाभारत के मुताबिक, अंत में धर्म की जीत हुई और अधर्म की हार हुई।

मोदीजी आप हंसी उड़ाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन आपसे गुजारिश है कि इसके लिए शल्य का नहीं बल्कि दूसरा उदाहरण चुनिए, क्योंकि शल्य प्रवृत्ति सच बोलने की प्रवृत्ति होती है, धर्म का साथ देने की प्रवृत्ति होती है। धर्म के लिए जान देने की प्रवृत्ति को शल्य प्रवृत्ति कहते हैं।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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