योजनाकारों की मुफलिसी

पाकिस्तान योजना आयोग में स्टाफ का बड़ा संकट है। काम का दबाव खासा बढ़ा हुआ है। परफॉरमेंस संतोषजनक नहीं है। ये तीनों खबरें अच्छी नहीं हैं। विजन 2025 के साथ ही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के मद्देनजर पिछले दो वर्षों में आयोग की भूमिका खासी बढ़ी है, मगर इसके किसी भी प्रोजेक्ट में पूर्णकालिक निदेशक नहीं हैं।

जिस संस्था को गतिविधियों का प्रमुख केंद्र होना चाहिए, उसका पूरा वक्त सबसे जरूरी चीज मानव संसाधन के संकट से जूझने में जाया हो रहा है। योजना और विकास सचिव ने स्वीकार किया कि आयोग के पास महज एक पूर्णकालिक प्रोजेक्ट डायरेक्टर है, जबकि इसे ऐसे 33 अफसरों की जरूरत है।

सिद्धांत रूप में 50 करोड़ रुपये से ज्यादा वाले किसी भी प्रोजेक्ट में पूर्णकालिक निदेशक होना जरूरी है, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। 32 पदों के रिक्त होने का नतीजा यह है कि काम विशेषज्ञ की बजाय निचले दर्जे के लोगों के हवाले है, जो अपने ही काम के बोझ से दबे हैं। सब कुछ तदर्थवाद का शिकार है। जाहिर है, यह संकट रातों-रात पैदा नहीं हुआ होगा। यह सिविल सर्विस के दीवालिएपन का नतीजा है। जाहिर है, नेतृत्व की कमी और अपने ही काम के बोझ से दबे मातहतों का उतना सक्षम न होना हालात को और गंभीर बना रहा है। वे इसलिए भी कुछ नहीं करना चाहते कि उन्हें लगता है, इन पदों पर आखिर बहाली होगी ही, और तब उनके किए की कोई गिनती नहीं रह जाएगी।

जाहिर है, दूसरी पंक्ति के अधिकारियों की यह सोच उन्हें किसी पहल से रोकती है। आठ में से छह बड़े पद खाली पड़े होने के कारण भी आयोग का बुरा हाल है। कुछ पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू भी हुई, तो वह इतनी धीमी है कि किसी काम की नहीं। कभी-कभी लगता है कि प्रधानमंत्री इसमें रुचि ले रहे हैं, लेकिन किसी तरह का नियंत्रण न होने से सब कुछ फिर जस का तस हो जाता है। यह एक ऐसा मामला है, जिससे देश के विकास से जुड़े अधिकांश काम प्रभावित हो रहे हैं। इसमें जल्द ही सार्थक पहल की जरूरत है। सच तो यह है कि वर्षों से जो अनदेखी हुई है, उसके लिए अब बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। (द एक्सप्रेस ट्रिब्यून, पाकिस्तान से साभार)

(साई फीचर्स)



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