रंग से पहचानी जा सकेगी खाने लायक बर्फ

अब उद्योगों और खाने-पीने में इस्तेमाल होने वाली बर्फ के बीच अंतर को पहचाना जा सकेगा। फूड ऐंड ड्रग अडमिनिस्ट्रेटिव (एफडीए) ने हाल में बर्फ फेक्ट्रियों और बीएमसी अधिकारियों के साथ इस संबंध में एक बैठक की। बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया, जिस पर सभी ने सहमति जताई।

एफडीए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘हमने प्रस्ताव को सरकार के पास भेजा है। सरकार भी प्रस्ताव को लेकर काफी सकारात्मक है। अनुमति मिलते ही इसे राज्य भर में इसे लागू किया जाएगा।

इसलिए पहचान जरूरी

दरअसल, खाने-पीने और उद्योगों में होने वाली बर्फ की गुणवत्ता में काफी अंतर होता है। खाने-पीने में इस्तेमाल होने वाली बर्फ साफ पानी से बनती है, जबकि उद्योगों में उपयोग होने बर्फ में इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता।

रंग एक जैसा होने की वजह से कई बार उद्योगों में जाने वाली बर्फ को आम इस्तेमाल के लिए बेच दिया जाता है। डॉक्टरों के अनुसार, आम इस्तेमाल वाली बर्फ में अगर पीने के पानी का उपयोग नहीं होता है, तो इससे पेट की कई तरह की समस्याएं भी हो सकती हैं।

अमेरिका से मिला आइडिया

एफडीए कमिश्नर पल्लवी दराडे ने कहा, ‘अमेरिकन एफडीए पहले से ही खाने-पीने बर्फ में इस तरह का अंतर रख रहा है। अमेरिका में खाने-पीने के अलावा इस्तेमाल होने वाली बर्फ का रंग नीला होता है। वहीं, से हमें यह आइडिया आया।अगर, सरकार से हरी झंडी मिलती है, तो देश में महाराष्ट्र ऐसा पहला राज्य होगा।

सफेद बर्फ: गोलों, जूस या अन्य खाने-पीने के इस्तेमाल में लगने वाली बर्फ का रंग पहले जैसा ही होगा।

नीली बर्फ: शव घरों, दवाओं को ठंडा रखने के लिए, सीमेंट फैक्ट्री इत्यादि जगहों पर इस्तेमाल की जाएगी।

(साई फीचर्स)


नोट :ये नुस्‍के आजमाने के पहले जानकार चिकित्‍सक से एक बार मशविरा अवश्‍य कर लें।

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