रक्का तभी आबाद होगा

चार महीने के संघर्ष के बाद पिछले हफ्ते अमेरिकी फौज को रक्का में मिली जीत एक बड़ा प्रतीकात्मक महत्व रखती है। रक्का आईएसआईएस की वास्तविक राजधानी थी। कभी सीरिया का संपन्न शहर रहे रक्का में दो लाख से ज्यादा लोग बसते थे, मगर आज यह मलबों के ढेर में तब्दील हो गया है और यहां के ज्यादातर बाशिंदे अपनी जान बचाने के लिए भाग चुके हैं। आईएस द्वारा बिछाए बारूदी सुरंगों के जाल और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण अब भी लोग रक्का लौटना नहीं चाहते।

सवाल पूछा जा रहा है कि क्या रक्का का पुनरोद्धार हो सकता है? क्या यह मध्य-पूर्व में शांति का प्रतीक स्थल बन सकता है? पिछले एक साल में इराक और सीरिया के अनेक शहर आईएस के चंगुल से आजाद कराए जा चुके हैं, मगर रक्का एक मुश्किल मोर्चा बना रहा, क्योंकि यह पहला बड़ा शहर था, जिस पर साल 2014 में आईएस ने कब्जा किया था। इसकी त्रासद स्थिति इस पूरे इलाके की बदनसीबी की नुमाइंदगी करती है।

अमूमन आतंकियों का उदय वहीं पर होता है, जहां एक राजनीतिक-सामाजिक खालीपन हो। लेकिन रक्का के मामले में जो खालीपन पैदा हुआ, वह सीरिया की असद हुकूमत और लोकतंत्र समर्थक गुटों के संघर्ष से पैदा हुआ। रक्का अब अमेरिका समर्थित सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) के हाथों में है, जो कि कुर्दों और अरबों का गठजोड़ है। अमेरिका, ब्रिटेन, सऊदी अरब और दूसरे अनेक देश रक्का में स्थिरता बहाल करने और इसके पुनर्निर्माण के लिए धन इकट्ठा करने पर विचार कर रहे हैं। रक्का को आतंकियों और असद हुकूमत, दोनों से सुरक्षित रखने के लिए एसडीएफ और हाल ही में गठित रक्का सिविल कौंसिल को फौरन एक लोकतांत्रिक सरकार गठित करनी चाहिए।

रक्का के बाशिंदे तभी लौटेंगे, जब उन्हें यह यकीन होगा कि उनके शहर में एक व्यवस्था काम करने लगी है और वह शांतिपूर्ण तरीके से जातीय व मजहबी मसलों के हल निकाल सकती है। जंग भले ही फौजी ताकत से जीती जा सकती हो, पर शांति सिर्फ आजादी, इज्जत और बराबरी जैसी ताकतों के बूते ही स्थापित हो सकती है। (द क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर, अमेरिका से साभार)

(साई फीचर्स)



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