राजा राम मोहन राय को साधुवाद

100 साल से भी पुरानी बात है। जगह पश्चिम बंगाल के हुगली में राधानगर। उन दिनों आज की तरह सब भाई अलग-अलग नहीं रहते थे। सबका आंगन एक ही होता था। ऐसे ही एक घर में जन्मे एक लड़के का लालन-पालन उसकी भाभी ने किया। लड़का किस दिन क्या पहनेगा या उसकी कौन सी कॉपी भरने वाली है, भाभी को सब पता होता था।

कभी किसी को लगा ही नहीं कि वह लड़के की भाभी है या मां है। घर में सबके विरोध के बावजूद सबसे लड़कर भाभी ने उसे पढ़ने के लिए घर से दूर भेजा। जब लड़का लौटा तो पता चला कि न तो उसकी भाभी जीवित हैं और न ही बड़ा भाई। दरअसल बड़े भाई के मरने पर ढोल नगाड़ों की आवाज के शोर में चीखती-चिल्लाती भाभी की आवाज दब गई। उसको बालों से पकड़कर घसीटते हुए मसान तक ले जाया गया और पति की जलती चिता में झोंक दिया गया।

जनाने मर्द मंत्र पढ़ रहे थे और नामर्द औरतें श्सती मैया की जयश् के उद्घघोष से पूरे माहौल में शोर भरी उदासी भर रही थीं। पूरे विधि-विधान से जीवित स्त्री को आग के हवाले करके सब लोग अपने-अपने घरों को वापस लौट गए। अगले दिन सुबह जब गांव का एक व्यक्ति शौच के लिए मसान की ओर गया तो उसने देखा कि वह भाभी तो आधी जली हुई नग्नअवस्था में झाड़ियों में छुपी हुई है। हर हाल में वह जिंदा रहना चाहती थी। शायद उसे देखना चाहती थी, जिसे कुछ बना देने के सपने के साथ खुद से दूर किया था।

दोबारा पूरा गांव आया और इस बार हड्डियां जलती देखकर ही वापस लौटा। उस भाभी के देवर का नाम था राजा राम मोहन राय। जिसकी वजह से आज न जाने कितनी भाभियां जिंदा हैं। हालांकि हमारे देश में थैंक्स कहने का रिवाज है नहीं, लेकिन हम जंगलियों के लिए राम मोहन राय किसी पैगंबर से कम नहीं थे। शुक्रिया राम मोहन राय।

(साई फीचर्स)



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