राहुल बदले, बुजुर्ग नेताओं को मिली राहत

(सुमित माहेश्‍वरी)

नई दिल्ली (साई)। राहुल गांधी के लिए कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं में प्रणव मुखर्जी और मनमोहन सिंह 2 अपवाद हैं। गांधी इन दोनों नेताओं से निजी और सार्वजनिक तौर पर मार्गदर्शन लेते रहे हैं। लेकिन सोमवार को कांग्रेस मुख्यालय में अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन भरे जाने से पहले राहुल गांधी के इन दोनों नेताओं से मिलने और आशीर्वाद लेने में एक सांकेतिक संदेश छिपा हुआ है- पार्टी की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के साथ सहज है।

अगर यह जानबूझकर किया गया तो इसकी वजह पार्टी में पीढ़ियों का टकराव हो सकता है। कांग्रेस में पीढ़ियों के टकराव की बहस तभी से चल रही है जब युवा राहुल गांधी ने पार्टी नेतृत्व की तरफ पहला कदम उठाया था। एक युवा महासचिव को पुरानी पीढ़ी के नेताओं में खास दमखम नहीं दिखा जो चाहता था कि न सिर्फ युवा नेता उभरें जो पुराने की जगह लें बल्कि पुराने तरीकोंकी जगह नई सोच ले।

राहुल के इस ब्लूप्रिंट को लेकर शुरुआत से ही कांग्रेस के पुराने नेताओं में संदेह था लेकिन 2014 में कांग्रेस के सत्ता खोने के बाद यह मुखर हुआ। पार्टी के नेतृत्व की उनकी एक्सपेरिमेंटलस्टाइल पर कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सवाल उठाए, जिन्हें लगा कि विपक्ष में रहते हुए पार्टी का फोकस खुद को मजबूत करने पर होना चाहिए न कि नए-नए प्रयोग करने पर।

इस तरह की पृष्ठभूमि के बीच कांग्रेस ने पीढ़ीगत बदलाव पर जश्नवाले अंदाज से जरूर चौंकाया जब पार्टी के नेताओं को हुजूमअकबर रोड मुख्यालय पहुंचकर राहुल गांधी के लिए शीर्ष पद को प्रस्तावित किया। कांग्रेस के दिग्गजों के साथ-साथ राज्यों इकाइयों के नेता भी इस मौके पर मौजूद थे।

यह स्पष्ट है कि समय के साथ कांग्रेस में पीढ़ीगत बदलाव का समय परिपक्व हुआ पीढ़ीगत समझौता आकार ले सका। इस डील के दौरान वरिष्ठ नेताओं ने पुराने तरीकोंको जारी रखने के लिए आक्रामक लॉबिंग की और राहुल गांधी ने कुछ कदम आगे बढ़ते हुए सीनियर नेताओं को उनके भविष्य और अपनी एक्सपेरिमेंटलस्टाइल को लेकर आश्वस्त किया। अब सीनियरों को उम्मीद होगी कि राहुल पार्टी को उस संकट से उबार सकेंगे जिसे अस्तित्व के संकट के तौर पर देखा जा रहा है।

कई का मानना है कि कुछ राज्यों के पिछले चुनावों में राहुल गांधी के नेतृत्व ने पार्टी का मनोबल बढ़ाने में मदद की है। कांग्रेस में कुछ बदलाव भी दिख रहे हैं। अचानक कांग्रेस में हिंदू पहचानको लेकर हिचक खत्म होती दिख रही है और पार्टी यह दिखा रही है कि इसमें और सेक्युलरिजमके उसके आदर्श के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि समय के साथ पार्टी बीजेपी की उस चालाक रणनीति को ध्वस्त कर सकेगी जिसमें वह कांग्रेस को प्रो-माइनॉरिटीके तौर पर प्रचारित करती है जिससे जमीन पर ध्रुवीकरण में मदद मिलती है।

राहुल गांधी के सामने बतौर कांग्रेस अध्यक्ष कई चुनौतियां होंगी। वह पार्टी के अनुभवी नेताओं को साथ लेकर चलने की तत्परता दिखा चुके हैं। राहुल गांधी राज्यों की इकाइयों को वरिष्ठ नेताओं के हाथ में देने को तैयार हैं। राहुल के इस नजरिए ने बुजुर्ग नेताओं के हाशिये पर चले जाने के डर को बहुत हद तक खत्म किया है।



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