विचारणीय है बाल जिज्ञासा

(शरद खरे)

बाल सुलभ हरकतों के लिये बचपन को जाना जाता है। बच्चों के प्रश्न में उनके मानस पटल पर उभर रहीं जिज्ञासाओं को समझा जा सकता है। इससे यह अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है। समाज में किस तरह की बातों और परंपराओं के बीज बोये जा रहे हैं।

बीते दिनों छपारा थाने में पुलिसिया कार्यवाही से रूबरू बच्चों के द्वारा दारोगा से यह पूछना कि उनका टॉर्चर रूम कहां है? ने अनेक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिये हैं। बच्चों के मन में टॉर्चर रूम की भावना आखिर आयी तो आयी कहां से? क्या समाज में किसी तरह का टॉर्चर रूम अस्तित्व में है?

जाहिर है इसका उत्तर नकारात्मक ही आयेगा। समाज में टॉर्चर रूप कहीं भी नहीं है। दरअसल अस्सी के दशक के उपरांत रूपहले पर्दे के विकल्प के रूप में उभरे टीवी ने समाज की दिशा को मोड़ा है। समाज के अंदर अधकचरी संस्कृति की सड़ांध अगर उठती दिख रही है तो इसके पीछे कहीं न कहीं टीवी पर दिखाये जा रहे सीरियल्स की कलुषित मानसिकता ही दोषी नजर आती है।

एक समय था जब शराब को वाकई सामाजिक बुराई के रूप में देखा जाता था। शराब का सेवन करने वाले को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है। आज शादी ब्याह, मेले ठेलों या अन्य आयोजनों में शराब की व्यवस्था अभिन्न अंग बन चुकी है। क्या इसे ही विकास का पैमाना माना जायेगा?

हाल ही में रविवार को बच्चों के गायन के एक टीवी शो में निर्णायकों जिनमें एक महिला भी शामिल थीं के द्वारा एक अन्य निर्णायक को सार्वजनिक रूप से बच्चों की मम्मी के प्रति आकर्षित होने के फिकरे जिस तरह हंस हंस कर दिये जा रहे थे, उससे समाज में क्या संदेश जा रहा होगा!

देखा जाये तो इस तरह के फूहड़ प्रदर्शनों से समाज की वर्जनाएं टूटना स्वाभाविक ही हैं। इस तरह के प्रदर्शनों को अश्लील की श्रेणी में रखा जाकर इनका प्रदर्शन बंद किया जाना चाहिये। समाज में जिस तरह से युवाओं की सोच आकार ले रही है या ले चुकी है वह रातों-रात तो निश्चित तौर पर नहीं ही बनी होगी। इसके लिये लंबा समय लगा होगा, जिसमें उनकी मानसिकता बनी होगी।

टीवी पर दिखाये जाने वाले आपराधिक सीरियल्स में टॉर्चर रूम को भी दिखाया जाता है। इस तरह के दृश्यों को बाल सुलभ मन सच ही मान लेता है और उसकी परिणिति के रूप में सामने आते हैं टॉर्चर रूम जैसे प्रश्न। सिवनी के दोनों सांसदों बोध सिंह भगत एवं फग्गन सिंह कुलस्ते को चाहिये कि वे संसद में इन बातों को पुरजोर तरीके से उठायें और टीवी के माध्यम से फैल रही अश्लीलता पर विराम लगाने की प्रभावी कवायद करें।



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