विदेशी काया में बसी भारतीय रूह

(विष्णु खरे)

अदाकारी का पेशा विरोधाभास और विडंबना की संतान होता है। कलाकार अपनी निजी जिंदगी में पैदा कुछ होता है, उसमें भी अपने स्तर पर चाहे-अनचाहे बदलता रहता है लेकिन अपनी शक्ल-ओ-सूरत, काबिलियत, फन और हुनर के मुताबिक उसे स्टेज-स्टूडियो में चंद बनाने-वालों और हजारों-लाखों दर्शकों के लिए उनकी अलग-अलग मांग के अनुसार ताजिंदगी नए चेहरे पहनने पड़ते हैं लेकिन इसमें भी कुछ मामलों में कल्पनातीत समस्याएं सामने आती हैं।

टॉम ऑल्टर को कायदे से अगर ऐक्टर होना ही था तो वह अमेरिका में अमेरिकी फनकार हो सकते थे या ज्यादा-से-ज्यादा यूरोप में गोरे, यूरोपीय अभिनेता। वह ऐसे अमरीकी माता-पिता के बेटे थे जिनका कोई ताल्लुक अदाकारी से नहीं था बल्कि जो अंग्रेजों के जमाने में उत्तर भारत में ईसाइयत के पादरी-प्रचारकों के रूप में हिंदुस्तान आए थे। जब लड़का टॉम बड़ा होने लगा तो उसे भारतीय स्कूलों में देसी बच्चों के साथ ही पढ़ने भेजा जाने लगा। गिरजाघर का सारा काम हिंदी-उर्दू के बगैर चल नहीं सकता था। बालक टॉम लगभग जन्म से ही अमेरिकी-हिंदुस्तानी, पश्चिम-गंग-ओ-जमन की तिहरी तहजीब की जानिब खिंच गया। हिंदी फिल्में इस सांस्कृतिक संगम की मुख्यधारा में थीं।

कुछ बुजुर्गों को यह जानकर सदमा पहुंचेगा कि किशोर-जवान टॉम हॉलिवुड के अपने किसी पश्चिमी स्वदेशी या दिलीप-राज-देव जैसे कोई और फेमस, देसी बड़े ऐक्टर का मुरीद नहीं बल्कि तत्कालीन भारत के करोड़ों दर्शकों के चहेते, 1968 की सुपर-हिट हिंदी फिल्म आराधना के नए-युवा सुपर-स्टार राजेश खन्ना का अंध-भक्त हो चुका था। यह जुनून ऐसा था कि टॉम ऑल्टर ने राजेश खन्ना की टक्कर का एक दूसरा महानायक बनने के लिए पुणे के ताजा-ताजा फिल्म इंस्टिट्यूट में कामयाबी से दाखिला ले डाला।

वहां टॉम की मुलाकात अपने सहपाठी शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी आदि से तो हुई लेकिन एक बड़ी, तकलीफदेह सचाई से भी उनका तार्रुफ हुआ। बेशक उनमें एक बेहतरीन ऐक्टर होने की सारी खूबियां थीं लेकिन एक ऐसा नुक्स था जिसका इलाज अब खुदा के बस की भी बात न थी- वह खूबरू, गोरे-नारे, हीरो, मुहज्जब, अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू उम्दा लिखने-पढ़ने-बोलने वाले, सब कुछ थे लेकिन दक्षिण एशिया की पैदाइश नहीं लगते थे। जरूरत से ज्यादा फॉरनर दिखते थे। कलर फिल्मों के जमाने में सारी हीरोइनें उनके सामने सांवली नजर आतीं। फिल्म में उनका नाम विजय, अजय, शंकर आदि नहीं रखा जा सकता था। उनके परिवार को हिंदू-मुस्लिम दिखाना नामुमकिन-सा था।

सिनेमा में बाजाब्ता दाखिल होने से पहले ही टॉम ऑल्टर टाइप्ड हो गए। उनपर फिरंगी होने का ठप्पा लग गया। 1977 की धर्मेंद्र-हेमा मालिनी की वाहियात फिल्म चरस में उन्हें एक विदेशी स्मगलर का बहुत अदना रोल मिला। लेकिन ऑल्टर आजीवन आभारी रहे सत्यजित राय के जिन्होंने तभी अपनी विख्यात फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी में उन्हें रिचर्ड एटेनबरो के एक मातहत जूनियर ब्रिटिश फौजी अफसर वेस्टन की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका दी और उनके हिंदुस्तानी तहजीब में रचे-बसे होने का पूरा फायदा उठाया। टॉम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने गए। उनके उर्दू-प्रेम का परिचय यही फिल्म देती है। लेकिन टॉम के लिए अपनी पूरी काबिलियत के मुताबिक काम हासिल कर पाना कभी आसान नहीं रहा जबकि विडम्बना यह रही कि सामान्य काम उन्हें लगातार मिलता रहा जिसमें वह प्रधानतः विदेशी या विदेशी-सरीखी या इसी तरह की पढ़ी-लिखी, संभ्रांत, कुलीन, रोबीली किंतु छोटी भूमिकाओं में आते रहे। जरायमपेशा भी कभी-कभी बनना पड़ा।

भारतीय सिनेमा में ऐसे अभिनेता एक ऐसी समस्या के सूचक हैं जो फिल्मों से कहीं व्यापक फलक घेरती है और हमारे समाज और इतिहास दोनों में गहरा दखल देती है। अंग्रेज हमारे यहां जहांगीर के शासन में ही आ चुके थे और उनका 1947 तक का इतिहास हमारा इतिहास भी है। करीब दो सौ वर्षों तक वह भारतीय समाज का हिस्सा रहे- हिंदू-मुस्लिम बिरादरियां आपस में इतनी नजदीक नहीं हो पाईं। अंग्रेजी में भारत पर सैकड़ों कहानियां, उपन्यास, संस्मरण आदि लिखे गए हैं और लिखे जा रहे हैं किन्तु भारतीय निर्माताओं-निर्देशकों को जितनी फिल्में भारत में अंग्रेज ऐतिहासिक उपस्थिति पर बनानी चाहिए थी, उसकी एक प्रतिशत भी नहीं बनीं।

ऐसे में टॉम ऑल्टर का ही नहीं, उन सारे संभावित विदेशी अभिनेता-अभिनेत्रियों का हिंदी फिल्मों में कोई भविष्य नहीं था जो नए-पुराने वास्तविक-काल्पनिक अंग्रेज किरदारों को निभा सकते या चाहते। यदि वह भारत छोड़कर विदेश में नहीं बसना चाहते थे और सिर्फ ऐक्टिंग करना चाहते थे तो उनके पास भारत की फिल्मों में जो काम मिले उसे तस्लीम करने के अलावा कोई चारा न था। क्योंकि विदेशी अभिनेता और निर्देशक जान चुके थे कि भारत में शायद ही कभी अंतरराष्ट्रीय फिल्में बनें इसलिए दोयम दर्जे की फॉरन प्रतिभाएं भी न यहां आईं और न बसीं। यह त्रासद था कि टॉम ऑल्टर भारत के सबसे बड़े विदेशी मूल के अभिनेता बन गए।

लेकिन टॉम ने भारत में अपनी विचित्र स्थिति को अपनी प्रतिभा और भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से एक अद्भुत सृजनात्मक मोड़ दिया। उन्होंने कई भारतीय भाषाओं की फिल्मों में अभिनय शुरू किया और उनकी ख्याति हिंदी से बाहर जाने लगी। इसी तरह वह समझ गए कि उन जैसे विशिष्ट फिल्मी अभिनेताओं को टीवी से परहेज नहीं करना चाहिए और वह निस्संकोच दूरदर्शन तथा अन्य चौनलों पर दिखाई देने लगे। दरअसल ऐसी मुम्बइया या भारतीय साहबी वर्जनाओं को लेकर उनका सोच खुला हुआ और लोकतांत्रिक था।

उन्होंने एक और साहसिक कदम उठाया- पृथ्वी थिएटर की परंपरा को वह आधुनिक उर्दू नाटक और अभिनय की ओर ले गए। उर्दू जुबान और रंगमंच को जब उन जैसा अदाकार मिला तो मुंबई के स्टेज में एक नई जिंदगी-सी आ गई।

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

0 Views

Related News

(शरद खरे) जिला मुख्यालय में छेड़छाड़ की घटनाओं में इजाफा होना चिंता का विषय है। हाल ही में बारापत्थर के.
मनरेगा में एलॉटमेंट का इंतजार कर रहीं पंचायतें (ब्यूरो कार्यालय) सिवनी (साई)। भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में भी.
हाईटेक होने की ओर अग्रसर है सिवनी पुलिस (अय्यूब कुरैशी) सिवनी (साई)। पुलिस अधीक्षक तरूण नायक के नेत्तृत्व में सिवनी.
(ब्यूरो कार्यालय) सिवनी (साई)। सुख - समृद्धि और वैभव के पाँच दिवसीय पर्व दीपावली की शुरुआत मंगलवार को धनतेरस के.
सीएम हेल्प लाईन के लिये फिर दिये कलेक्टर ने निर्देश (ब्यूरो कार्यालय) सिवनी (साई)। कलेक्टर गोपाल चंद्र डाड की अध्यक्षता.
(ब्यूरो कार्यालय) सिवनी (साई)। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए दीपावली के अवसर.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *