विनोवा भावे ने पूछा मां से मुझे बासी भोजन क्यों?

विनोबा भावे के बचपन की घटना है। उनका मित्र भी उनके घर में साथ रहा करता था। कभी-कभी घर में बासी भोजन बचा रहना स्वाभाविक है। उनकी माता भोजन फेंकने के विरुद्ध थीं, इसलिए बचा भोजन मिल-जुलकर थोड़ा-थोड़ा खा लिया जाता था। ऐसे अवसर पर माता विनोबा को बासी भोजन देकर उनके मित्र को ताजा खिलाने का प्रयास करती थीं। विनोबा को इस पर कोई आंतरिक विरोध नहीं था।

किंतु परिहास में उन्होंने मां से कहा, मां, आपके मन में अभी भेद है। मां प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखने लगीं। विनोबा ने हंसते हुए कहा, मां, देखो न, आप मुझे बासी भोजन देती हैं और मेरे साथी को ताजा। मां की उदारता को पक्षपात की संज्ञा देकर, विनोबा ने परिहास किया था, किंतु माता ने उसे दूसरे ढंग से लिया। बोलीं, बेटा, तू ठीक कहता है। मानवीय दुर्बलताएं मुझमें भी हैं। तुझमें अपना बेटा दिखता है तथा अभ्यागत में अतिथि।

इसे ईश्वर रूप अतिथि मानकर, सहज ही मेरे द्वारा यह पक्षपात हो जाता है। तुझे बेटा मानने के कारण तेरे प्रति अनेक प्रकार का स्नेह मन में उठता है। जब तुझे भी सामान्य दृष्टि से देख सकूंगी, तब पक्षपात की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। बात कहीं की कहीं पहुंच गई थी, पर विनोबा को प्रसन्नता हुई। माता का एक और उज्ज्वल पक्ष उनके सामने आया।

समाज के संतुलन तथा आध्यात्मिकता की पकड़ का महत्वपूर्ण सूत्र उन्हें मिल गया। पक्षपात मनुष्य के अंतःकरण को सहन नहीं होता। व्यक्ति अभाव स्वीकार कर लेता है, पक्षपात नहीं। अपने को पक्षपात से मुक्त अनुभव करने वाला अंतःकरण ही संतोष का अनुभव करता है। बालक विनोबा ने माता की शिक्षा गांठ बांध ली। संत विनोबा की समदर्शिता का यही गुण विकसित होकर समाज में आज भी व्यापक प्रभाव डाल रहा है।

(साई फीचर्स)



0 Views

Related News

एक राजा के पड़ोसी राजा ने उसके राज्य के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया। राज्य के इस हिस्से को.
जीवन में इच्छा, आशा और तृष्णा जरूरी है। ये बेड़ियां बड़ी आश्चर्यजनक हैं, लेकिन इससे जिसे बांध दो, वह दौड़ने.
100 साल से भी पुरानी बात है। जगह पश्चिम बंगाल के हुगली में राधानगर। उन दिनों आज की तरह सब.
वनवास के दौरान श्रीराम कुटिया में बैठे थे कि उनका शबरी से मिलने का मन हुआ। मन की बात मानते.
म्यांमार के राजा थिबा महान ज्ञानयोगी थे। जितना गहरा उनका ज्ञान था, उतने ही वे सरल और निरहंकारी थे। उनके.
बात उस वक्त की है जब जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद म्युनिसिपैलिटी के चेयरमैन थे। एक दिन वह कार्यालय में फाइलें देख.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *