शहादत याद करने का वक्त

यह हमारे जाबांज महिलाओं-पुरुषों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, लेखकों, डॉक्टरों सहित उन तमाम लोगों को याद करने का वक्त है, जिन्हें बांग्लादेश की आजादी की पूर्व संध्या पर अल-बद्र और रजाकार के दुर्दांत दस्तों ने ढूंढ़-ढूंढ़कर मार डाला था। पाकिस्तान के कब्जे वाली सेना के सहयोग से मारे गए ये लोग बड़ी उम्मीद से मुल्क की आजादी का इंतजार कर रहे थे।

दरअसल हत्यारों को गलतफहमी थी कि वे ऐसा करके उन उम्मीदों का गला घोंट देंगे, जो बांग्लादेश के उदय के साथ लगी हुई थीं, लेकिन आजादी के उत्साह ने उन्हें जैसी शिकस्त दी, उसका नतीजा सामने है। इन शहीद बौद्धिकों की यादें 1971 के मुक्ति संग्राम का वह महत्वपूर्ण अध्याय है, जो याद दिलाता है कि दुश्मन ने हताशा में कैसे-कैसे हथकंडे अपनाए? जब पाकिस्तान को अपनी हार तय दिखने लगी, तो उसने अपने बंगाली सहयोगियों रजाकार, अल-बद्र और अल-शम्श के साथ मिलकर देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों और पेशेवर लोगों के खात्मे की साजिश रची, ताकि एक नए बनते देश को बौद्धिक रूप से जर्जर बनाया जा सके।

इस कुत्सित साजिश का ही नतीजा था कि 14 दिसंबर को देश के कोने-कोने से हमारे बुद्धिजीवियों, लेखकों, संस्कृतिकर्मियों और अपने फन के माहिर तमाम लोगों की उनके घरों से उठाकर हत्या कर दी गई। नाजी जर्मनी के गेस्टापो वाले अंदाज की इस साजिश से हुए बौद्धिक नुकसान से देश आज भी उबर नहीं पाया है।

सच है कि न तो यह घाव कभी भुलाया जा सकता है और न इसके साजिश कर्ताओं को कभी माफ ही किया जा सकता है। यह उन बौद्धिकों और लड़ाकों का बलिदान ही है कि हम आजाद हैं, जिन्होंने भावी पीढ़ियों के भविष्य की खातिर अपना वर्तमान कुर्बान कर दिया, ताकि नई पीढ़ी आजाद और सार्वभौम मुल्क में सिर उठाकर जी सके। प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक बांग्लादेश की जड़ें मजबूत करने की ईमानदार कोशिश ही उन्हें असल श्रद्धांजलि होगी। उन शहादतों के संदेश अमल में लाना असल काम है। वे शहादतें हमें भविष्य में भी ताकत देती रहेंगी। यह ताकत ही एक दिन उनके गुनहगारों को दंडित करने में मददगार साबित होगी। (द इंडिपेंडेंट, बांग्लादेश से साभार)

(साई फीचर्स)



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