संस्थान बड़े दर्शन छोटे

(विनय जैसवाल)

कुछ ही रोज पहले मेरठ जाना हुआ। वहां के एक नामी इंटरनैशनल पब्लिक स्कूल में एक महिला टीचर से मुलाकात हुई। बातचीत के दौरान मैंने सहज जिज्ञासावश पूछ लिया कि आपको कितनी सैलरी मिलती है? उसने जो राशि बताई, सुनकर मेरे होश ही उड़ गए। यह मेरी समझ से बाहर था कि इतने बड़े और नामी स्कूल में जूनियर हाईस्कूल के बच्चों को पढ़ाने वाली पोस्ट ग्रैजुएट और बीएड समेत शिक्षक पात्रता परीक्षा पास किसी शिक्षक की सैलरी महज 8000 रुपये कैसे हो सकती है? लेकिन यह एक कड़वा सच है कि जिन पब्लिक स्कूलों की महंगी फीस भरते-भरते माता-पिता या अभिभावक रोजमर्रा की न जाने कितनी जरूरतों से समझौता करते हैं, वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों को आज के एक दिहाड़ी मजदूर से भी कम के वेतन लायक समझा जाता है। इस वेतन पर रखे गए लोगों से कैसे संस्थान के ऊंचे मानदंडों का पालन करने की उम्मीद की जाती होगी पता नहीं।

मुझे याद आया कि कुछ महीने पहले मिले मेरे एक परिचित अपने बेटे की ढंग की नौकरी न लगने से कितने दुखी थे। दरअसल उन्होंने अपने बेटे को एक नामी प्राइवेट इंजिनियरिंग कॉलेज से बीटेक कराने के लिए 20 लाख रुपए का लोन लिया था। बेटे को कोर्स पूरा किए दो साल बीत चुके हैं मगर अभी तक उसे कहीं मनमाफिक नौकरी नहीं मिल पाई है। जहां नौकरियां मिली भी वहां सैलरी 12-15 हजार रुपये से अधिक नहीं थी। अब उनके लिए अकेले लोन चुकाना मुश्किल हो रहा था।

ऐसे ही पिछले साल देश के एक नामी चौनल के पत्रकारिता संस्थान से टेलिविजन पत्रकारिता का कोर्स करके आए एक छात्र से मुलाकात हुई जो अपने करियर को लेकर काफी परेशान था। बता रहा था कि वह बुरी तरह से फंस गया है और उसे समझ नहीं आ रहा कि करे तो क्या करे। भरोसा दिलाया गया था कि उसे संस्थान के ही टेलिविज़न चौनल में नौकरी पर रख लिया जाएगा। रखा भी गया लेकिन 16000 रुपये प्रतिमाह की सैलरी वाली वह नौकरी दो महीने ही चली। इसके बाद उसे बिना कोई कारण बताए निकाल दिया गया। वह बता रहा था कि झांसी में उसके पिता की छोटी सी दुकान है और पिता ने अपनी जमीन का एक हिस्सा बेचकर कोर्स की लाखों की फीस और दिल्ली में रहने का उसका खर्च उठाया था।

यह हाल केवल शिक्षा, इंजिनियरिंग, पत्रकारिता का ही नहीं प्रबंधन, चिकित्सा, वकालत समेत तमाम क्षेत्रों का है, जहां लाखों रुपये खर्च करके डिग्री हासिल करने वाले छात्र-छात्राएं महज 10 से 15 हजार रुपये की सैलरी पर काम करने को मजबूर हैं। एमए, एमएससी और पीएचडी करके लाखों छात्र-छात्राएं बेरोजगार घूम रहे हैं। देश में बेरोजगारी की भयावह समस्या तो है ही एक अन्य समस्या यह है कि जिन्हें योग्यता के आधार पर नौकरी दी जाती है, उनकी भी सैलरी ऐसी होती है कि वे नौकरी पाकर भी दयनीय स्थिति में ही होते हैं। आज के समय में एक ऑटोचालक, सब्जीवाला, अखबारवाला, दूधवाला, प्लंबर, ड्राइवर और यहां तक कि चाय-पान की दुकान वाला भी महीने के 15 हजार से 50 हजार तक कमा लेता है। ऐसे में खुद सोचा जा सकता है कि महंगे कोर्स करने के बाद ऐसी नौकरी में हमारे युवा कैसा महसूस करते होंगे। पता नहीं ऐसे हताश और निराश युवाओं की फौज देश को किस ओर ले जाएगी!

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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