सदियों से धर्मों और समुदायों में गुंथा रहा है हमारा देश

(कृष्णा सोबती)

स्वतंत्रता प्राप्ति के 70 वर्षों बाद आजादी के दौर के सपने का ताना-बाना आज काफी बदल चुका है। राजनीतिक खेमों के हथकंडे, खुलेआम अपराधीकरण और अनुशासनहीनता ने भारतीय समाज के व्यावहारिक ढांचे को दूर तक प्रभावित किया है। संविधान द्वारा हर नागरिक को दिए गए बराबरी के अधिकारों को जमीन पर उतारने और फैलाने के बजाय हम उन्हें मतदान पेटियों तक सीमित कर दे रहे हैं। महात्मा गांधी ने देश के साधारण नागरिक की साधारणता को असाधारणता में बदला। भारतीय जनमानस को राजनीति और धर्म के व्यापक स्वरूप से जोड़ा। सभी धर्मों के प्रार्थना-स्वरों को एक सरगम में पिरो दिया। इसके मूल में भारत जैसे विशाल देश के एकत्व की प्रतिज्ञा ही थी। उन्होंने देश के अनाम भारतीयों, स्त्री-पुरुष और हर जाति-धर्म के लोगों को स्वराज की लड़ाई में नायक की तरह प्रतिष्ठित किया। उन्होंने निर्धन देशवासियों का परिधान धारण किया। श्वेत रंग अपनाया। उसे देश भर की संस्कारी मर्यादा दी। यह नैतिक निर्देश भी कि नेताओं के उजले वस्त्रों पर कोई छींटा न हो। कोई दाग न हो। वे उजले रहें और प्रजा आश्वस्त हो।

कमजोर पड़ते आदर्श

इन आदर्शों की संभावनाएं भला आज कहीं शेष हैं! राजनीतिक दलों के लिए विवादों को देर तक बनाए रखना, उन्हें प्रचार की हंडिया पर चढ़ाए रखना आज आम हो गया है। यह अच्छी राजनीतिक सेहत की निशानी नहीं है। चुनावी लोलुपता के लिए आक्रामक मंसूबों का प्रचार-प्रसार खोखला सिद्धांतहीन शोर है। लेकिन वे यह न भूलें कि संविधान की जिस धुरी के इर्द-गिर्द नागरिक संस्कृति राष्ट्रीय स्वरूप धारण करती है, वही उसका दिशा-निर्देश भी करती है। भारत का नागरिक समाज शिक्षा के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ चुका है। वह राजनीतिक दलों के दांव-पेच समझने लगा है। अतीत से वर्तमान, वर्तमान से भविष्य सभी मिलकर समय को गतिमान रखते हैं। हर घड़ी, मास, बरस, दशक और शताब्दियों से युगों तक बदलावों का सिलसिला चलता रहता है। आज के ऐतिहासिक स्वरूप को हम बदल नहीं सकते। टेक्नॉलजी के प्रभुत्व तले आज समूचा विश्व भौगोलिक सीमाओं को पार कर एक गांव जैसा लगता है। संप्रेषण साधनों ने बड़ी दुनिया को एक परिवार बना दिया है। क्या आज कहीं कोई इससे विलग हो अपने मनचाहे, मनमाने अस्तित्व में रह सकता है? ऐसा कोई देश है जो अंतरराष्ट्रीय संगठनों से दूर और अछूता हो!

पिछली पुरानी पीढ़ियों द्वारा अर्जित किए गए सिद्धांत और आदर्श हर दौर की युवा पीढ़ी के लिए विरासत बनकर देश की स्मृति-संपदा और संस्कार के रूप में जीवित रहते हैं। भूमंडलीकरण के दबाव तले नए-पुराने भारतीय मूल्य कभी एक-दूसरे से टकराते हैं, एक-दूसरे का सामना करते हैं तो कभी एक-दूसरे से आंखें भी चुराते हैं। लोग नई विश्व संस्कृति के अनुरूप, जिससे सारा भूमंडल संचालित है- शिक्षा, जीविका, प्रशिक्षण और व्यापार के लिए नए को अपनाते हुए आगे बढ़ जाते हैं। ऐसे में नए ज्ञान-विज्ञान के अनुशासनों को बाला-ए-ताक रखकर पुराने आश्रम, गुरुकुलों की मानसिकता को अपनाना कैसे मुमकिन होगा!

विभिन्न धर्मों और संप्रदायों का समाज रहा है हमारा राष्ट्र। इसी से भारत की विशिष्ट विचारधारा घनी होकर भारतीय मानस में उजागर हुई है। पूजा-पाठ और प्रभु को याद करने की रीतियां, नीतियां, प्रार्थना, उच्चारण, कर्मकांड, संस्कार सभी सम्मिलित रूप से राष्ट्रीय संस्कृति के वृहत स्वरूपों को प्रत्यक्ष करते हैं। ऐसे में आपसी मैत्री-भाव से हटकर अपने-अपने धर्म की आत्ममुग्धता में लीन होकर दूसरों के प्रतीकों को जलाना, नष्ट करना राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की स्वेच्छाचारी नरसंहारी प्रवृत्ति का ही द्योतक है। इस रोशनी में देखें तो जो भी बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, देशी-विदेशी, गिरजाघरों, मस्जिदों या अन्य पूजा-स्थलों को बर्बाद करने की राजनीति करेगा वह राष्ट्र के प्रति, राष्ट्र के एकत्व को घायल करने का घोर अपराधी होगा।

हमारा देश सदियों से विभिन्न धर्मों और समुदायों में गुंथा रहा है। इनमें से पनपी विभिन्न धार्मिक अभिव्यक्तियों ने हमारे सांस्कृतिक वैभव में कुछ ऐसा इजाफा किया है कि जैसे देश के विशाल आंगन को बेहिसाब रंगों से पूर दिया हो। भारत दर्शन, साहित्य और कलाओं का तीर्थ-स्थल रहा है। आज भी उसकी यह पहचान विश्व-भर में बनी हुई है। विभिन्न दिशाओं से छनते हुए विश्वास देश की बौद्धिक ऊर्जा में प्रवाहित हुए हैं। इसे सिर्फ बहुसंख्यकों की देन समझना इसकी साझी और घनी विरासत को अनदेखा करना होगा। भारतीय परंपरा में हम इससे भी अनभिज्ञ नहीं कि विश्वास की इसी स्वतंत्रता के लिए हम सैकड़ों-हजारों देवी-देवताओं के मनचाहे स्वरूप गढ़ चुके हैं। भारतीय समाज ने उन्हें और अन्य धर्मों को कबूल करने वालों को, अलग आस्था रखने वालों को उनके मानवीय अधिकारों के साथ स्वीकार किया। हमारे संविधान में भारतीय परंपरा के अनुसार और अनुरूप धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की नैतिक, सैद्धांतिक, सामाजिक और राजनीतिक कल्पना को साकार किया गया और उसे एक मजबूत लोकतंत्र की व्यवस्थित और व्यावहारिक नागरिक सत्ता का दस्तावेज बनाकर प्रस्तुत किया गया।

हिंसा का सहारा

कोई भी दलीय राजनीति अपने विस्तार को अगर हिंसा द्वारा प्रचारित करती है तो राष्ट्र का सांस्कृतिक पर्यावरण प्रदूषण से बच नहीं सकता। वैचारिक स्तर पर यदि लोकतंत्र के सैद्धांतिक और गणतांत्रिक मूल्य टुकड़ों में बंट जाते हैं तो जनमानस के एकत्व की राष्ट्रीय तेजस्विता राष्ट्रविरोधी शक्तियों के हाथों में जा पहुंचेगी और लोकतंत्र एक अनुशासनहीन अराजकता का ढांचा भर रह जाएगा। (लेखिका ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता उपन्यासकार हैं)

(साई फीचर्स)


डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया इसका समर्थन या विरोध नहीं कराती है।

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