साईबर पुलिस की सुस्त जाँच!

(शरद खरे)

भारत गणतंत्र सहित लगभग हर राष्ट्र में अगर कहीं अपराध घटित होता है तो उसकी जाँच का काम पुलिस का ही होता है। पुलिस सभी तरह की जाँच करती है। मामला चाहे आम आदमी से जुड़ा हो, जरायमपेशा लोगों से जुड़ा हो अथवा खुद पुलिस का ही क्यों न हो, पुलिस का काम ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ जाँच करने का है।

सिवनी जिले में सोशल मीडिया व्हाट्सएप के दो मामले जमकर उछले थे। एक मामला था लखनादौन के तत्कालीन नगर निरीक्षक देवी सिंह ठाकुर (वर्तमान अनुविभागीय अधिकारी पुलिस लखनादौन) के द्वारा सोशली मीडिया के एक समूह में कथित तौर पर अश्लील संदेश भेजने का। नगर निरीक्षक जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे किसी सरकारी नुमाईंदे के द्वार अगर सोशल मीडिया पर किसी तरह का अश्लील संदेश भेजा गया हो तो उसकी जाँच तो पुलिस को तत्काल ही की जाकर नज़ीर पेश करना चाहिये थी, ताकि लोग इसके अंजाम से भय खाकर इस तरह के अपराध करने के पहले सौ बार सोचें।

इस मामले में जबलपुर निवासी एक महिला पत्रकार के द्वारा अश्लील पोस्ट के स्क्रीन शॉट सहित जाँच का आवेदन पुलिस अधीक्षक को सौंपा गया था। एसपी कार्यालय से इस आवेदन पर जाँच का जिम्मा एसडीओपी घंसौर जे.पी. वर्मा को सौंपा गया था, इस मामले में क्या हुआ, शायद ही कोई जानता हो!

इसके अलावा दूसरा मामला केवलारी के युवा तुर्क विधायक रजनीश हरवंश सिंह से जुड़ा था। रजनीश हरवंश सिंह के मोबाईल से एक अश्लील क्लिप सोशल मीडिया पर डाली गयी थी। इस मामले में भी क्या हुआ, आज तक शायद ही कोई जानता हो! हो सकता है मामले रसूखदारों से जुड़े हैं शायद इसलिये इनकी जाँच को ठण्डे बस्ते के हवाले कर दिया गया हो!

इस तरह के मामलों में सियासी दलों का मौन भी आश्चर्यजनक ही माना जायेगा। सियासी दलों के साथ ही साथ समाज सेवा का दंभ भरने वाले पंजीकृत और अपंजीकृत सामाजिक एवं गैर राजनैतिक संगठनों के द्वारा भी अब तक एक शब्द नहीं बोला गया है। यह भी आश्चर्य का ही विषय माना जायेगा।

वैसे भी सोशल मीडिया व्हाट्सएप पर इस समय युवाओं का क्रेज बढ़ता जा रहा है। व्हाट्सएप पर अश्लीलता बढ़ती जा रही है। यह माना जा सकता है कि अश्लीलता को रोकने का दायित्व समाज और पालकों का है पर, अगर खाकी पर इस तरह से अश्लीलता परोसने के आरोप लगें तो, यह अनुचित ही माना जायेगा।

आज संचार क्रांति के युग में यह पता करना बहुत दुष्कर कार्य नहीं है कि किसके मोबाईल से क्या डाउनलोड किया गयाा? किस समय किया गया और कब पोस्ट किया गया? इसके बाद भी लंबा समय बीतने के बाद भी अब तक दोनों ही प्रमुख मामलों में पुलिस के द्वारा किसी तरह का आधिकारिक बयान न दिया जाना भी आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है।

इसमें जाँच अधिकारी के द्वारा उस समूह के अन्य सदस्यों के मोबाईल नंबर से जानकारी ली जानी चाहिये थी पर, पता नहीं क्यों पुलिस अपने ही अधिकारी की जाँच में हीला हवाला करती नजर आ रही है जिसका अच्छा संदेश नहीं जा रहा है और खाकी बदनाम होती दिख रही है।



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